उत्तर प्रदेश में दंगाइयों से वसूली का नया कानून बना सियासी मुद्दा

By अजय कुमार | Mar 17, 2020

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जुलूस, प्रदर्शन, बंदी, हड़ताल के दौरान सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ वसूली का जो नया कानून बनाया है। उसको लेकर जहां एक धड़ा खुश नजर आ रहा है तो दूसरी तरफ ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं है जो इस कानून को लेकर आशंकित हैं, जो आशंकित हैं उन्हें लगता है कि यह लोकतंत्र के लिए काला कानून साबित होगा। यह कानून सरकार के खिलाफ मुंह खोलने वालों की आवाज दबाने की साजिश साबित होगा। उक्त कानून का क्या प्रभाव होगा ? क्या इस कानून के आने से निजी और सरकारी संपत्ति के नुकसान को रोका जा सकेगा ? कहीं इसका राजनैतिक दुरूपयोग तो नहीं होगा ? इस कानून की आड़ लेकर सरकार निरंकुश तो नहीं हो जाएगी। हो सकता है कि जल्द ही इस कानून के खिलाफ कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाएं। वहां इसका क्या हश्र होगा यह भी देखने वाली बात होगी।

यह सब समझने से पहले योगी सरकार के उक्त आदेश की बारीकियां भी समझना जरूरी है। नये वसूली कानून के तहत जिस किसी व्यक्ति पर सरकारी या निजी संपत्ति को क्षति पहुंचाने का अरोप सिद्ध हो जाएगा। उसकी संपत्तियां कुर्क हो जाएंगी और उनके पोस्टर सड़क चौराहों पर लगा दिए जाएंगे। यूपी सरकार के उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेजेज टु पब्लिक ऐंड प्राइवेट प्रॉपर्टी अध्यादेश−2020 को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने मंजूरी दे दी है। इसके तहत वसूली से जुड़ी सुनवाई और कार्रवाई के लिए सरकार रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में क्लेम ट्राइब्यूनल बनाएगी। इसके फैसले को किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। सरकार ने दंगाइयों पर कार्रवाई करने के लिए सख्त अध्यादेश तैयार किया है। इसमें क्लेम ट्राइब्यूनल को आरोपितों की संपत्तियां अटैच करने और इनकी कोई और न खरीद सके इसके लिए पोस्टर व होर्डिंग लगवाने का पूरा अधिकार होगा।

क्लेम ट्राइब्यूनल में अध्यक्ष के अलावा एक सदस्य भी होगा, जो सहायक आयुक्त स्तर का होगा। नुकसान के आकलन के लिए ट्राइब्यूनल दावा आयुक्त की तैनाती कर सकता है। दावा आयुक्त की मदद के लिए एक−एक सर्वेयर भी उपलब्ध करवाया जा सकता है। ट्राइब्यूनल को दीवानी अदालत की तरह अधिकार होंगे। नए कानून में तीन माह के अंदर भुक्तभोगी को क्लेम ट्राइब्यूनल के समक्ष अपना दावा पेश करना होगा और उपयुक्त वजह होने पर दावे में हुई देरी को लेकर 30 दिन का अतिरिक्त समय दिया जा सकेगा। दावा पेश करने के लिए 25 रुपए कोर्ट फीस के साथ आवेदन करना होगा। अन्य आवेदन के लिए 50 रुपए कोर्ट फीस और 100 रुपए प्रॉसेस फीस देनी होगी। आरोपित को क्लेम आवेदन की प्रति नोटिस के साथ भेजी जाएगी। आरोपित के न आने पर ट्राइब्यूनल को एक पक्षीय फैसले का अधिकार होगा। ट्राइब्यूनल संपत्ति को हुई क्षति के दोगुने से अधिक मुआवजा वसूलने का आदेश नहीं कर सकेगा लेकिन मुआवजा संपत्ति के बाजार मूल्य से कम भी नहीं होगा।

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उधर, योगी सरकार द्वारा अध्यादेश लाने के साथ ही इसका विरोध भी शुरू हो गया है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रदेश सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकार में बैठे लोगों ने दंगे करवाए। केंद्र में एक कानून पी. चिदंबरम ने बनाया था, वह उसी में जेल गए। आखिर यूपी सरकार किसके लिए कानून बना रही है। केंद्रीय गृह मंत्री यूपी के सीएम से नाराज हैं, इसीलिए उन्होंने कहा कि दंगाई यूपी से आए थे।

यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार 'लल्लू' ने दंगाइयों से वसूली के लिए नया कानून बनाए जाने और दंगाइयों के पोस्टर चौराहों पर लगाए जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्वक आंदोलन करने वालों का पोस्टर सरेआम कर मुख्यमंत्री ने उनका चरित्र हनन करने का काम किया है। योगी आदित्यनाथ खुद दंगाइयों के सरगना हैं। ऐसे में दंगाइयों के रूप में योगी को पहले स्वयं का पोस्टर लगाना चाहिए क्योंकि पूर्वांचल के कई जिलों में उन पर अनेकों मुकदमे दर्ज हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने लखनऊ में योगी और उनके मंत्रियों का पोस्टर लगाकर बीजेपी की मंशा के अनुरूप उनके नेताओं का आपराधिक इतिहास बताने का काम किया है तो योगी जी ने उनको गिरफ्तार करवा लिया।

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती जो आजकल चौतरफा घिरी हुई हैं, उन्होंने भी दंगाइयों से वसूली के लिए योगी सरकार द्वारा बनाए गए नये कानून को योगी सरकार का तानाशाही रवैया करार दिया है। मायावती का कहना था इस कानून के सहारे योगी सरकार अपने राजनैतिक विरोधियों को प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी।

-अजय कुमार

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