ईरान संकट और वेनेजुएला उम्मीदों के बीच कच्चे तेल की कीमतें सात हफ्तों के उच्च स्तर पर

By Ankit Jaiswal | Jan 13, 2026

सोमवार को वैश्विक तेल बाज़ार में हलचल साफ़ दिखी। कच्चे तेल की कीमतें करीब सात हफ्तों के उच्च स्तर पर जाकर बंद हुईं। इसकी बड़ी वजह ईरान को लेकर बढ़ती चिंताएं रहीं, जहां सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर सख्ती के चलते उसके तेल निर्यात में गिरावट की आशंका जताई जा रही है। बता दें कि ईरान प्रतिबंधों का सामना कर रहा ओपेक का सदस्य देश है और उसके निर्यात में किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर वैश्विक आपूर्ति पर पड़ता है।


मौजूद जानकारी के अनुसार ब्रेंट क्रूड वायदा 0.8 प्रतिशत बढ़कर 63.87 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड 0.6 प्रतिशत की बढ़त के साथ 59.50 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। गौरतलब है कि यह ब्रेंट का 18 नवंबर के बाद और डब्ल्यूटीआई का 5 दिसंबर के बाद का सबसे ऊंचा बंद स्तर रहा है।


ईरान के संदर्भ में स्थिति और संवेदनशील तब हो गई जब वहां विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा है। ईरान ने कहा है कि वह वॉशिंगटन के साथ संवाद के रास्ते खुले रखे हुए है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप संभावित जवाबी कदमों पर विचार कर रहे हैं। रविवार को ट्रंप ने यहां तक कहा कि अमेरिका ईरानी अधिकारियों से बातचीत कर सकता है और जरूरत पड़ी तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला है।


गौरतलब है कि प्रतिबंधों के चलते ईरान के पास समुद्र में बड़ी मात्रा में तेल भंडारित है, जो लगभग 50 दिनों के उत्पादन के बराबर बताया जा रहा है। चीन द्वारा कम खरीद और संभावित अमेरिकी हमलों के खतरे को देखते हुए ईरान अपनी आपूर्ति बचाने की कोशिश कर रहा है।


वहीं दूसरी ओर, कीमतों में तेज़ उछाल को कुछ हद तक वेनेजुएला से संभावित आपूर्ति ने थामे रखा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के सत्ता से हटने के बाद वेनेजुएला जल्द ही तेल निर्यात दोबारा शुरू कर सकता है। पिछले सप्ताह ट्रंप ने संकेत दिया था कि कराकस सरकार अमेरिका को प्रतिबंधित तेल का बड़ा हिस्सा सौंप सकती है। इसके चलते तेल कंपनियां टैंकर और लॉजिस्टिक्स की तैयारी में जुट गई हैं।


अन्य मोर्चों पर भी आपूर्ति जोखिम बने हुए हैं। रूस में यूक्रेन के हमलों से ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचा है और मॉस्को पर नए प्रतिबंधों की आशंका बनी हुई है। वहीं अज़रबैजान में 2025 के दौरान तेल निर्यात में गिरावट दर्ज की गई है। गौरतलब है कि रूस और अज़रबैजान दोनों ही ओपेक+ समूह का हिस्सा हैं।


नॉर्वे में भी तेल और गैस उद्योग को लेकर बहस तेज़ है। प्रधानमंत्री जोनास गार स्टोरे ने साफ कहा है कि यह उद्योग देश के लिए बेहद अहम है और इसे खत्म करने की बजाय विकसित किया जाना चाहिए।


इस बीच अमेरिकी बैंक गोल्डमैन सैक्स का मानना है कि साल के आगे बढ़ने के साथ नई आपूर्ति आने से तेल कीमतों पर दबाव बन सकता है, हालांकि रूस, ईरान और वेनेजुएला से जुड़ी भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बाज़ार में उतार-चढ़ाव बनाए रखेंगी।


अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। ट्रंप प्रशासन और फेडरल रिजर्व के बीच तनाव बढ़ने से निवेशक सतर्क हैं। जानकारों का कहना है कि कम ब्याज दरें आर्थिक गतिविधियों और तेल मांग को बढ़ा सकती हैं, लेकिन इससे महंगाई नियंत्रण की चुनौती भी खड़ी हो सकती है, यही वजह है कि ऊर्जा बाज़ार आने वाले दिनों में भी वैश्विक घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए रखे हुए हैं।

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