दादा भाई नौरोजी के बिना कांग्रेस का इतिहास अधूरा है

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Sep 04, 2019

द ग्रैंड ओल्डमैन आफ इंडिया के नाम से मशहूर दादा भाई नौरोजी ब्रिटिश संसद में चुने जाने वाले पहले एशियाई थे। संसद सदस्य रहते हुए उन्होंने ब्रिटेन में भारत के विरोध को प्रस्तुत किया। दादा भाई नौरोजी ने भारत की लूट के संबंध में ब्रिटिश संसद में ड्रेन थ्योरी पेश की। इस ड्रेन थ्योरी में भारत से लूटे हुए धन को ब्रिटेन ले जाने का उल्लेख था। कांग्रेस का इतिहास लिखने वाले प्रो. एसआर मेहरोत्रा ने बताया कि नौरोजी अपनी वाक् कला से लोगों को अचंभित करते थे। वह जब ब्रिटिश संसद के लिए सदस्य चुने गए तो उन्होंने संसद में कहा कि मैं धर्म और जाति से परे एक भारतीय हूं। वह कहा करते थे कि जब एक शब्द से काम चल जाए तो दो शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। एक लिबरल के रूप में वह 1892 में हाउस आफ कामंस के लिए चुने गये। मेहरोत्रा ने बताया कि नौरोजी एक कुशल उद्यमी थे। 1939 में पहली बार नौरोजी की जीवनी लिखने वाले आरपी मसानी ने जिक्र किया है कि नौरोजी के बारे में 70 हजार से अधिक दस्तावेज थे जिनका संग्रह ठीक ढंग से नहीं किया गया।

मेहरोत्रा ने बताया कि वेडबर्न डब्ल्यू सी बनर्जी और एओ ह्यूम की तरह दादा भाई नौरोजी के बिना कांग्रेस का इतिहास अधूरा है। उन्होंने जो पत्र लिखे हैं उनका संग्रह और संरक्षण किया जाना बहुत जरूरी है। ग्रैंड ओल्ड मैन आफ इंडिया 30 जून 1917 को दुनिया को अलविदा कह गए। नौरोजी गोपाल कृष्ण और महात्मा गांधी के गुरु थे। नौरोजी सबसे पहले इस बात को दुनिया के सामने लाए कि ब्रिटिश सरकार किस प्रकार भारतीय धन को अपने यहां ले जा रही है। उन्होंने गरीबी और ब्रिटिशों के राज के बिना भारत नामक किताब लिखी। वह 1892 से 1895 तक ब्रिटिश संसद हाउस आफ कामंस के सदस्य रहे। एओ ह्यूम और दिनशा एडुलजी वाचा के साथ मिलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय उन्हें जाता है। मनेकबाई और नौरोजी पालनजी डोर्डी के पुत्र दादा भाई नौरोजी का जन्म एक गरीब पारसी परिवार में चार सितंबर 1825 को गुजरात के नवसारी में हुआ। नौरोजी शुरुआत से काफी मेधावी थे। वर्ष 1850 में केवल 25 वर्ष की उम्र में प्रतिष्ठित एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए। इतनी कम उम्र में इतना सम्मानजनक ओहदा संभालने वाले वह पहले भारतीय थे।

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लार्ड सैलसिबरी ने नौरोजी को ब्लैक मैन कहा था। हालांकि वह बहुत गोरे थे। उन्होंने संसद में बाइबिल से शपथ लेने से इंकार कर दिया था। अंग्रेजों की कारस्तानियों को बयान करने के लिए उन्होंने एक पत्र रस्त गोतार शुरू किया जिसे सच बातों को कहने वाला पत्र कहा जाता था। वर्ष 1874 में वह बड़ौदा के प्रधानमंत्री बने और तब वे तत्कालीन बंबई के लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य चुने गये। उन्होंने मुंबई में इंडियन नेशनल एसोसिएशन की स्थापना की जिसका बाद में कांग्रेस की स्थापना के बाद विलय कर दिया गया। नौरोजी 1886 में कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये। मेहरोत्रा ने कहा कि नौरोजी के पत्र उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें अपनी किताब का प्रकाशन कराने में लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। नौरोजी तीन बार कांग्रेस अधिवेशनों के अध्यक्ष रहे।

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