Darius Khambata ने Tata Trusts छोड़ने का किया फैसला, Tata Sons लिस्टिंग और RBI वार्ता पर असंतोष

By Ankit Jaiswal | Nov 02, 2026

टाटा समूह के भीतर चल रही खींचतान अब उसके प्रमुख ट्रस्टों तक पहुंच गई है। इस विवाद के बीच वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी के रूप में दोबारा नियुक्ति नहीं लेने का फैसला किया है। उन्होंने टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा को पत्र लिखकर साफ कर दिया है कि वह अब इन संस्थाओं में अपनी जिम्मेदारी जारी नहीं रखना चाहते। उनका कार्यकाल 9 नवंबर को समाप्त हो रहा है। खंबाटा के इस फैसले से टाटा संस के भविष्य और उसके शेयर बाजार में लिस्टेड होने को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

खंबाटा के मुताबिक, इसके लिए टाटा संस को या तो अपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी की पहचान छोड़नी थी या फिर अपने कारोबार का ढांचा बदलना था। उन्होंने 17 सितंबर की टाटा संस बोर्ड बैठक को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि उस दिन कंपनी के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन को 5 साल का सेवा विस्तार देने और कंपनी को शेयर बाजार में लिस्टेड करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का फैसला किया गया था।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, खंबाटा के इस फैसले के पीछे एक वजह यह भी हो सकती है कि 9 नवंबर को दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव आने पर उन्हें समर्थन न मिले। ट्रस्ट के भीतर पहले से ही मतभेद हैं। उपाध्यक्ष विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन, नोएल टाटा के कुछ प्रस्तावों का विरोध कर रहे हैं। वहीं, नोएल टाटा, नेविल टाटा और भास्कर भट्ट समेत 4 न्यासियों ने कंपनी के पुनर्गठन की योजना का समर्थन किया था। खंबाटा ने 11 सितंबर 2025 को नोएल टाटा के वीटो अधिकार बनाए रखने के फैसले का भी समर्थन किया था।

इस पूरे विवाद की जड़ टाटा संस की नियामकीय स्थिति है। भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर में टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में अपना पंजीकरण छोड़ने की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद कंपनी के शेयर बाजार में लिस्टेड होने की संभावना बढ़ गई। टाटा संस का बोर्ड पंजीकरण छोड़कर कंपनी को निजी और गैर-लिस्टेड बनाए रखना चाहता था।

बता दें कि टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ट्रस्ट नहीं चाहते कि कंपनी शेयर बाजार में आए। उनका कहना है कि रिजर्व बैंक द्वारा पंजीकरण छोड़ने की अर्जी खारिज किए जाने का मतलब यह नहीं है कि कंपनी को तुरंत शेयर बाजार में उतरना ही होगा। उनके मुताबिक, दूसरे कानूनी विकल्प भी तलाशे जाने चाहिए।

इसी कड़ी में टाटा संस के पुनर्गठन का प्रस्ताव सामने आया था। इसके तहत टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का टाटा संस के साथ विलय करने की योजना थी। इससे कंपनी केवल निवेश रखने वाली संस्था के बजाय निवेश और कारोबार दोनों संभालने वाली कंपनी बन सकती थी। माना जा रहा था कि इससे उस पर लागू नियामकीय नियमों में बदलाव हो सकता है और उसे गैर-लिस्टेड रहने का रास्ता मिल सकता है।

हालांकि, इस योजना ने ट्रस्ट के भीतर विवाद और बढ़ा दिया। वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने आरोप लगाया कि उन्हें अहम चर्चाओं और फैसलों से दूर रखा गया। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि पुनर्गठन से ट्रस्टों की धर्मार्थ संस्थाओं वाली स्थिति पर क्या असर पड़ेगा। मामला महाराष्ट्र के धर्मार्थ आयुक्त तक पहुंच गया है, जहां से सर रतन टाटा ट्रस्ट के संबंध में रोक लगाने वाला आदेश भी जारी किया गया है।

गौरतलब है कि खंबाटा ने नवंबर 2025 में ट्रस्ट के भीतर किसी कब्जे या सत्ता पलट की कोशिश से जुड़ी अटकलों को खारिज किया था। उन्होंने नोएल टाटा को अध्यक्ष बनाए जाने का समर्थन किया था और टाटा संस को लिस्टेड करने के भी खिलाफ थे। ऐसे में उनका मौजूदा फैसला यह दिखाता है कि कंपनी को गैर-लिस्टेड रखने के लिए कोई व्यावहारिक और नियामकीय रूप से स्वीकार्य रास्ता निकालना कितना मुश्किल हो रहा है। नोएल टाटा के सामने अब ट्रस्ट के भीतर सहमति बनाने और टाटा संस के भविष्य पर फैसला लेने की चुनौती और बढ़ गई है। इन घटनाओं के बीच टाटा समूह की आगे की रणनीति पर निवेशकों और उद्योग जगत की नजरें बनी हुई हैं।

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