By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 04, 2026
(लैमुएल लाल) भोपाल, तीन अगस्त मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव में छह बार के विधायक नरोत्तम मिश्रा की जगह नए चेहरे को उम्मीदवार बनाने का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का फैसला सफल नहीं रहा। कांग्रेस ने यह सीट बरकरार रखी, जिसके बाद सत्तारूढ़ दल ने केंद्रीय नेतृत्व के फैसले की अवहेलना करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के संकेत दिए। उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने सोमवार को भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 मतों से हराया।
मिश्रा अपने लंबे राजनीतिक करियर में डबरा (ग्वालियर) से तीन और दतिया से तीन बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। मिश्रा के सैकड़ों समर्थकों ने 10 और 11 जुलाई को दतिया में एक प्रमुख राजमार्ग को 12 घंटे से अधिक समय तक अवरुद्ध किया था। इस दौरान संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस के साथ झड़प की घटनाएं भी सामने आई थीं, जिसमें जिला पुलिस अधीक्षक समेत कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, मध्यप्रदेश में यह लंबे समय बाद पहला मौका था जब केंद्रीय नेतृत्व के उम्मीदवार चयन के खिलाफ खुला विरोध देखने को मिला। उन्होंने कहा कि राज्य इकाई ने मिश्रा का नाम केंद्रीय नेतृत्व को भेजा था, लेकिन आंतरिक सर्वेक्षण और फीडबैक के आधार पर तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया। मिश्रा के समर्थक इस फैसले से नाराज थे क्योंकि वह कई सप्ताह से क्षेत्र में प्रचार कर रहे थे और दतिया सीट से फिर उम्मीदवार बनाए जाने की उम्मीद कर रहे थे।
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र भारती से 7,000 से अधिक मतों से हार गए थे। हालांकि, विरोध के बाद मिश्रा ने अपने समर्थकों से पार्टी के फैसले को स्वीकार करने और भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में काम करने की अपील की थी। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित ने कहा कि भाजपा की हार केवल एक सीट का नुकसान नहीं है, बल्कि यह पार्टी की चुनावी मशीनरी और कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाती है।
उन्होंने कहा कि मिश्रा जैसे प्रभावशाली नेता को टिकट नहीं दिए जाने और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शन ने अनुशासित पार्टी के रूप में भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचाया है। दीक्षित के अनुसार, विरोध शांत होने तक पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच चुका था। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं में एकजुटता का संदेश देने के लिए आयोजित सभा में मिश्रा की भावनात्मक अपील भी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी।
इसका उदाहरण यह है कि कांग्रेस उम्मीदवार को मिश्रा के मतदान केंद्र पर भी भाजपा से अधिक मत मिले। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि पार्टी जनादेश की समीक्षा करेगी और निष्कर्षों के आधार पर अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा, ‘‘भाजपा के लिए अनुशासन सर्वोपरि है।
प्रत्येक कार्यकर्ता से अपेक्षा की जाती है कि वह किसी भी पद पर रहते हुए पार्टी के अनुशासन के भीतर काम करे। यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।’’ इस जीत के बाद 230 सदस्यीय मध्यप्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायकों की संख्या बढ़कर 65 हो गई है। भाजपा के पास 164 विधायक हैं, जबकि एक सीट भारतीय आदिवासी पार्टी के पास है।
मिश्रा ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भाजपा के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं और उनका अपना समर्थक वर्ग है। भाजपा ने दिसंबर 2018 से मार्च 2020 के 15 महीने के अंतराल को छोड़कर वर्ष 2003 से लगातार मध्यप्रदेश में सरकार बनाई है।