By अभिनय आकाश | Jun 25, 2026
भारत और अमेरिका के बीच में चल रहे ट्रेड टॉक्स में एक बहुत ही बड़ा ट्विस्ट आया है। या फिर यह भी कहना गलत नहीं होगा कि भारत ने अब अमेरिका की तरफ टेबल टर्न कर दिया है। अभी तक भारत अमेरिका के ऊपर यह शर्त लगा रहा था कि हम तब तक डील साइन नहीं करेंगे जब तक अमेरिका भारत को बाकी देशों के मुकाबले में कम टैरिफ ऑफर नहीं करेगा। अब भारत ने उसके साथ में एक और बहुत ही बड़ी डिमांड कर दी है। जिसमें कि भारत के द्वारा सनसेट क्लॉज़ की डिमांड की गई है। यह एक ऐसा नया और बड़ा दांव है, जिसे भारत ने अमेरिका के साथ चल रही इस महा-ट्रेड डील की मेज पर पटक दिया है! तो यह क्लॉज़ कुछ और नहीं, बल्कि भारत के लिए एक मजबूत 'सुरक्षा कवच' है। रिपोर्ट की मानें तो नई दिल्ली का वाशिंगटन से सीधा कहना है कि देखिए बॉस, आपकी आर्थिक नीतियां और फैसले इतनी तेजी से बदलते हैं कि अब हम केवल आपके खोखले वादों और आश्वासनों के भरोसे नहीं बैठ सकते! जिस रफ्तार से पिछले कुछ समय में अमेरिकन पॉलिसीज में बड़े उलटफेर देखने को मिले हैं, उसे देखते हुए इस ट्रेड डील में एक 'सनसेट क्लॉज़' का होना अब बेहद अनिवार्य हो चुका है और इसके बिना भारत इस डील में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाएगा। अब सवाल उठता है कि आखिर क्या है यह सनसेट क्लॉज़? भारत को अचानक इस क्लॉज़ को लाने की प्रेरणा कहाँ से मिली? अगर यह डील में शामिल होता है, तो इससे भारत को क्या-क्या बड़े फायदे होने वाले हैं? इन सभी कूटनीतिक और आर्थिक पहलुओं का आज हम एमआरआई स्कैन करेंगे।
भारत द्वारा इस समय व्यापार समझौते में 'रिव्यू मैकेनिज्म' या 'सनसेट क्लॉज' (समीक्षा व समाप्ति शर्त) पर जोर देना, पिछले एक साल के दौरान अमेरिका के भीतर बदली आर्थिक नीतियों और अनिश्चितताओं से सीधा जुड़ा हुआ है। आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताएं बाजार पहुंच, स्थिर टैरिफ दरों और नियमों के भरोसे पर आगे बढ़ती हैं, लेकिन जब कोई देश अपनी नीतियां बार-बार बदलता है, तो ये सारे अनुमान कमजोर पड़ जाते हैं। अमेरिकी बाजार में हाल ही में हुए टैरिफ संशोधनों, कानूनी विवादों और नीतिगत बदलावों को देखते हुए नई दिल्ली अब केवल मौखिक आश्वासनों के भरोसे कोई बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहती। असल चिंता व्यापार समझौते को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर है कि भारत द्वारा बड़े नीतिगत वादे और निवेश कर दिए जाने के बाद अगर वाशिंगटन की परिस्थितियां अचानक बदल गईं, तो क्या होगा। यही वजह है कि भारत एक ऐसा 'सनसेट क्लॉज' चाहता है जो भविष्य में किसी भी बड़े नीतिगत झटके के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच की तरह काम करे और आर्थिक आधार बदलने पर दोनों देशों को नए सिरे से मेज पर बैठने का कानूनी अधिकार दे।
भारत की सोच पर असर डालने वाली एक अहम घटना 20 फरवरी को हुई। उस दिन, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 से एक फ़ैसला सुनाया, जिसने अमेरिका में टैरिफ़ तय करने के अधिकार से जुड़े कानूनी ढांचे को बदल दिया। इस फ़ैसले में यह निष्कर्ष निकाला गया कि कुछ आपसी द्विपक्षीय टैरिफ़ लगाने के लिए पहले जिस कार्यकारी कानून का इस्तेमाल किया जाता था, वह अधिकृत नहीं था; इस तरह टैरिफ़ तय करने की शक्तियाँ असल में कांग्रेस को वापस मिल गईं। इस फ़ैसले के अहम नतीजे निकले क्योंकि इसने उन धारणाओं को बदल दिया जिन पर पहले व्यापार से जुड़ी बातचीत आधारित थी। फ़ैसले के बाद, टैरिफ़ के एक ऐसे ढांचे की उम्मीद कम निश्चित हो गई जिसके बारे में पहले काफ़ी हद तक अंदाज़ा लगाया जा सकता था। इसके बाद, अमेरिका टैरिफ़ के एक अलग ढांचे की ओर बढ़ गया, जबकि साथ ही वह व्यापार को लागू करने वाले अलग-अलग तरीकों पर भी निर्भर रहा। इनमें सबसे अहम हैं सेक्शन 301 के तहत होने वाली जांच, जो अमेरिकी व्यापार नीति का एक अहम हिस्सा बनी हुई हैं। यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव के ऑफिस ने मार्च में जांच शुरू की, जिसमें मुख्य रूप से स्ट्रक्चरल एक्सेस कैपेसिटी (ज़रूरत से ज़्यादा उत्पादन क्षमता) और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी चिंताओं पर ध्यान दिया गया। इन जांचों में कई अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं और अगर वॉशिंगटन इस नतीजे पर पहुंचता है कि कुछ विदेशी नीतियां अमेरिकी व्यापार पर बुरा असर डाल रही हैं, तो इसके चलते व्यापार से जुड़े और भी कदम उठाए जा सकते हैं। भारत के लिए इससे अनिश्चितता पैदा होती है। भले ही आज टैरिफ में छूट को लेकर बातचीत हो जाए, लेकिन जांच या नीतिगत फैसलों के कारण भविष्य में होने वाले व्यापारिक कदमों से उन छूटों का व्यापारिक मूल्य बदल सकता है। इन जाँचों से जुड़ी सार्वजनिक सुनवाई 7 जुलाई को होनी है। इससे यह संकेत मिलता है कि ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने के बाद भी टैरिफ से जुड़ी स्थिति में बदलाव जारी रह सकता है। 'सनसेट क्लॉज़' अमेरिका को अपने घरेलू ट्रेड कानूनों का इस्तेमाल करने से नहीं रोकेगा। बल्कि, यह भारत को एक औपचारिक मौका देगा कि अगर मूल आर्थिक समझौते में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो वह अपनी प्रतिबद्धताओं पर फिर से विचार कर सके।
टैरिफ (सीमा शुल्क) के मोर्चे पर, दोनों देशों के बीच चर्चा का मुख्य फोकस इस बात पर है कि भारतीय निर्यात को प्रभावित करने वाले शुल्कों को कैसे कम किया जाए और इसके साथ ही, भारतीय बाजार में अमेरिकी उत्पादों की पहुंच को कैसे बढ़ाया जाए। अमेरिका विशेष रूप से भारत में अपने कृषि उत्पादों जैसे कि ट्री नट्स (बादाम, अखरोट आदि), ताजे फल, सोयाबीन तेल और पशु चारे (जैसे ज्वार या सोरघम) के लिए बड़े अवसरों और रियायतों की तलाश कर रहा है। दूसरी ओर, भारत अपनी रणनीति पर अड़े रहते हुए अपने उन क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है जो आर्थिक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं, जिनमें मुख्य रूप से गेहूं, चावल और डेयरी उत्पाद शामिल हैं। बातचीत सिर्फ़ पारंपरिक सामानों के व्यापार तक ही सीमित नहीं है। ऊर्जा और टेक्नोलॉजी भी चर्चा के अहम हिस्से बन गए हैं। वॉशिंगटन अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना चाहता है और साथ ही भारतीय बाज़ार में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वाले उपकरणों जिनमें डेटा-सेंटर हार्डवेयर और ग्राफ़िक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स शामिल हैं। उनके लिए अपनी पहुँच बनाना चाहता है। इसके बदले, भारत से उम्मीद है कि वह इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, एयरक्राफ्ट के पार्ट्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे प्रोडक्ट्स पर ड्यूटी कम करके अमेरिकी टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन में अपनी भागीदारी को और मजबूत करेगा। हालांकि, इन मौकों के साथ कुछ ज़िम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत पांच साल की अवधि में 500 अरब डॉलर तक के अमेरिकी सामान खरीदने का वादा कर सकता है। ऐसे वादों के लिए लंबी अवधि की योजना और खरीद के तरीकों में बड़े बदलावों की ज़रूरत होगी, जिसमें रूसी कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना भी शामिल है। यही एक मुख्य कारण है कि भारत अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की मांग कर रहा है।
एक चिंता का विषय अमेरिकी औद्योगिक सामान, एडवांस्ड मशीनरी, इन्फॉर्मेशन और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी हार्डवेयर और मेडिकल डिवाइस की ज़्यादा पहुंच है। कई लोगों का तर्क है कि अच्छी क्वालिटी वाले इक्विपमेंट तक बेहतर पहुंच से प्रोडक्टिविटी बढ़ सकती है, इंडस्ट्रियल आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिल सकता है और कॉम्पिटिटिवनेस बेहतर हो सकती है। हालांकि, उन भारतीय मैन्युफैक्चरर्स पर पड़ने वाले असर को लेकर भी चिंताएं हैं जो अभी सरकार समर्थित इंडस्ट्रियल प्रोग्राम के तहत विस्तार कर रहे हैं। खास तौर पर उन कंपनियों पर ध्यान दिया गया है जिन्हें प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम से फायदा हो रहा है। इनमें से कई कंपनियां अभी भी प्रोडक्शन बढ़ा रही हैं और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सेक्टर में क्षमताएं विकसित कर रही हैं। अगर टैरिफ में कटौती के बाद इम्पोर्ट तेज़ी से बढ़ता है, तो पॉलिसी बनाने वाले यह आकलन करना चाह सकते हैं कि क्या घरेलू इंडस्ट्री पर बुरा असर पड़ रहा है। 'सनसेट क्लॉज़' तीन से पांच साल बाद समीक्षा का एक व्यवस्थित मौका दे सकता है, जिससे अधिकारी औद्योगिक विकास, निवेश के तरीकों और मैन्युफैक्चरिंग में प्रतिस्पर्धा-क्षमता पर समझौते के असर का मूल्यांकन कर सकें। अनुमानों पर निर्भर रहने के बजाय, नीति-निर्माता यह तय करने से पहले असल नतीजों की जांच कर सकेंगे कि मौजूदा वादों को बिना किसी बदलाव के जारी रखा जाए या नहीं।
अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर क्या इस पैंतरे से भारत अपने प्रतिद्वंदी देशों को पछाड़ पाएगा? जवाब है-बिल्कुल! भारत इस ट्रेड डील के जरिए अमेरिकी बाजार में ऐसी 'स्पेशल एंट्री' यानी तरजीही पहुंच चाहता है, जो उसे एशिया की बाकी प्रतिस्पर्धी इकोनॉमीज़ के मुकाबले एक बहुत बड़ा एडवांटेज दे दे। भारत का यह दांव विशेष रूप से टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग), लेदर (चमड़ा), इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स, केमिकल्स और फूड प्रोसेसिंग जैसेक्टर्स के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। इसकी वजह यह है कि ये सारे उद्योग बहुत ही कम प्रॉफिट मार्जिन पर काम करते हैं। इसका मतलब ये हुआ कि टैक्स या टैरिफ दरों में होने वाला जरा सा भी अंतर या छोटा सा बदलाव भी यह तय कर देता है कि अमेरिकी बायर्स किस देश को करोड़ों का कॉन्ट्रैक्ट सौंपेंगे। रिपोर्ट्स की मानें तो नई दिल्ली ने अमेरिका के सामने साफ तौर पर ऐसी शर्तें रखी हैं, जो भारतीय एक्सपोर्टर्स को वियतनाम और कई आसियान देशों जैसे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में खड़ा कर देंगी। दरअसल, भारत की सबसे बड़ी चिंता यही है कि आज जो ट्रेड डील बड़े चाव से साइन की जा रही है, उसकी वैल्यू कल को तब कौड़ियों के भाव हो जाएगी, जब अमेरिका बाद में किसी और देश को इससे भी ज्यादा रियायतें दे देगा। बस, इसी घाटे से बचने के लिए भारत यह पूरी बिसात बिछा रहा है। सामने आ रही खबरों से पता चलता है कि वॉशिंगटन ने चल रही व्यापार प्रक्रियाओं के तहत अलग-अलग विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए टैरिफ की अलग-अलग कैटेगरी पर विचार किया है। खबरों के अनुसार, भारत को कुछ खास फ्रेमवर्क के तहत 12.5 प्रतिशत की प्रस्तावित अतिरिक्त ड्यूटी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों को 10 प्रतिशत वाली कैटेगरी में रखा गया है। भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए, इस तरह के अंतर के महत्वपूर्ण कमर्शियल नतीजे हो सकते हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो, यह सनसेट क्लॉज़ कंम्पटीशन को पूरी तरह खत्म नहीं करेगा, लेकिन यह भारत को एक ऐसा 'लीगल बैकअप' और लिखित मौका जरूर दे देगा कि अगर कल को प्रतिद्वंदी देश अमेरिकी बाजार में भारत से भी बेहतर और सस्ती पहुंच हासिल कर लेते हैं, तो भारत इस पूरे एग्रीमेंट को री-ओपन कर सके और अमेरिका से कह सके कि अब शर्तों को दोबारा बदलो!