By एकता | Jun 23, 2026
उत्तर भारत में हर साल गर्मियों के आते ही आग लगने का यह जानलेवा चक्र शुरू हो जाता है। हाल ही में 3 जून को दिल्ली के हौज रानी में एक बिल्डिंग में आग लगने से 23 लोगों की जान चली गई, और 22 जून को लखनऊ की एक बहुमंजिला इमारत में आग ने 15 युवाओं की जान ले ली। इन दोनों हादसों की वजह भी शॉर्ट सर्किट और बिल्डिंग में सुरक्षा नियमों की अनदेखी को माना जा रहा है।
अक्सर आग एकदम से नहीं लगती, बल्कि यह धीरे-धीरे शुरू होती है। जब किसी भारी उपकरण (जैसे AC या गीजर) को पतले तार से जोड़ा जाता है या जहां दो तार मिलते हैं वह जोड़ ढीला होता है, तो वहां रेजिस्टेंस बढ़ने लगता है। गर्मी की वजह से वह जोड़ धीरे-धीरे और ढीला हो जाता है, जिससे दोनों तारों के बीच बाल के बराबर गैप आ जाता है। बिजली इस गैप को पार करने के लिए कूदती है, जिससे लगातार चिंगारियां निकलती हैं। यह चक्र अंदर ही अंदर तब तक चलता रहता है जब तक कि वहां भयंकर आग न लग जाए।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ज्यादातर इलेक्ट्रिकल सामान और तार 33 डिग्री के नॉर्मल टेम्परेचर के हिसाब से डिजाइन किए जाते हैं। लेकिन गर्मियों में उत्तर भारत का तापमान 45 डिग्री से ऊपर चला जाता है। ऐसे में तारों की बिजली ले जाने की क्षमता कम हो जाती है और वे बहुत जल्दी गर्म होकर पिघलने लगते हैं। आसान शब्दों में कहें तो, गर्मियों में तारों पर बाहर के मौसम का भी दबाव होता है, और ठीक उसी समय घरों में AC और रेफ्रिजरेटर जैसे भारी उपकरण भी नॉन-स्टॉप चल रहे होते हैं।
दिल्ली-NCR के कई अपार्टमेंट्स में AC फटने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। AC को स्टार्ट होने के लिए एक बड़े पावर बूस्ट की जरूरत होती है, जो 'कैपेसिटर' नाम के पुर्जे से मिलता है। तेज धूप और लगातार चलने से जब यह कैपेसिटर गर्म होकर कमजोर पड़ता है, तो मोटर पर दबाव आता है और वह जल जाती है। इसके अलावा, AC के लगातार वाइब्रेशन से उसके अंदरूनी तार ढीले हो जाते हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ जाता है। आजकल AC में R-32 या प्रोपेन जैसी गैसों का इस्तेमाल होता है, जो ज्वलनशील होती हैं। अगर AC की आउटडोर यूनिट से गैस लीक हो रही हो और वहां शॉर्ट सर्किट से एक छोटी सी चिंगारी भी निकले, तो वह तुरंत एक बड़े धमाके में बदल जाती है।