By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 05, 2026
नयी दिल्ली, पांच अक्टूबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 2019 में हुई हिंसा के दौरान छात्रों के खिलाफ पुलिस की कथित बर्बर कार्रवाई की एसआईटी (विशेष जांच दल) से जांच कराने के अनुरोध वाली याचिकाएं सोमवार को खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि जब कोई जमावड़ा शांतिपूर्ण नहीं रह जाता, तो पुलिस से मूकदर्शक बने रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस शुरू में विश्वविद्यालय में दाखिल नहीं हुई थी, जब जमावड़ा शांतिपूर्ण और जामिया परिसर तक ही सीमित था।
पीठ ने कहा, “जब कोई जमावड़ा शांतिपूर्ण नहीं रह जाता और हालात हिंसा, संज्ञेय अपराध या जानमाल को खतरे का संकेत देते हैं, तो पुलिस से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह निष्क्रिय रहे या सिर्फ मूकदर्शक बनकर देखती रहे, भले ही वह जमावड़ा विश्वविद्यालय परिसर के अंदर ही क्यों न हुआ हो।” उसने कहा, “दिसंबर 2019 की घटनाओं ने निस्संदेह लोगों के बीच काफी चिंता पैदा की और विभिन्न पक्षों के आचरण को लेकर गंभीर आरोपों को जन्म दिया।” पीठ ने केवल शिक्षण संस्थानों के भीतर पुलिस की कार्रवाई को नियंत्रित करने वाले अलग नियम बनाने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि 15 दिसंबर 2019 को हुए विरोध-प्रदर्शन धीरे-धीरे विश्वविद्यालय परिसर के बाहर आसपास के क्षेत्र में हिंसा में बदल गए, जिसमें पथराव, बसों और अन्य वाहनों में आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और पुलिसकर्मियों पर हमले जैसी घटनाएं शामिल थीं। उच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस ने जिस तरह से हस्तक्षेप किया, उसमें भी कुछ कमियां थीं।
उसने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के निष्कर्षों का जिक्र किया, जिनमें साफ तौर पर कहा गया था कि विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के अंदर आंसू गैस के गोले दागने से बचा जा सकता था। उच्च न्यायालय ने कहा कि विश्वविद्यालय शिक्षा और अकादमिक गतिविधियों की जगह है, इसलिए पुलिस के अधिकारों का इस्तेमाल करते समय इस अहम बात को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए। पीठ ने कहा, “हालांकि, इस बात का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि पुलिस के हर हालात में विश्वविद्यालय परिसर में दाखिल होने पर रोक है।
जहां हालात में तुरंत दखल देने की जरूरत हो, वहां पुलिस से सिर्फ इसलिए बाहर खड़े रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह परिसर किसी शैक्षणिक संस्थान का है।” उच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस के हस्तक्षेप से पहले विश्वविद्यालय के अधिकारियों को सूचित किया जाना चाहिए और जहां हालात इजाजत दें, उनसे सलाह भी ली जानी चाहिए। उसने कहा कि यहां तक कि ‘आदर्श पुलिस नियमावली’ में भी यह प्रावधान है कि परिसर में प्रवेश करने से पहले, जहां तक संभव हो, शिक्षण संस्थान के प्रमुख को सूचित किया जाए। अदालत ने कहा, “हालांकि, यह आवश्यकता हर स्थिति में एक अनिवार्य शर्त के तौर पर लागू नहीं की जा सकती।
जानमाल को तत्काल खतरा, गैरकानूनी जमावड़ा, संज्ञेय अपराध या तेजी से बिगड़ती कानून-व्यवस्था की स्थिति ऐसी हो सकती है, जिसमें पहले से सूचना देने या अनुमति लेने के लिए समय ही न हो।” उसने कहा, “पुलिस को संस्थान के अलावा अन्य स्रोतों से भी जानकारी मिल सकती है। हालांकि, इससे पुलिस की कार्रवाई जांच-पड़ताल के दायरे से बाहर नहीं हो जाती।” जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दिसंबर 2019 में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क उठी थी। अदालत में याचिका दायर करने वालों में जामिया के छात्र, अधिवक्ता, ओखला (जहां विश्वविद्यालय स्थित है) के निवासी और संसद के सामने स्थित जामा मस्जिद के इमाम शामिल थे।
पीठ ने याचिकाएं यह कहते हुए खारिज कर दी कि नये सिरे से स्वतंत्र जांच का आदेश देने, जांच स्थानांतरित करने, मुआवजा देने, नए दिशा-निर्देश तैयार करने या आगे कोई और निर्देश जारी करने का कोई आधार नहीं है। उच्च न्यायालय ने कहा कि ये घटनाएं 15 दिसंबर 2019 को हुई थीं और तब से छह साल से ज्यादा समय बीत चुका है। उसने इस बात पर भी गौर किया कि आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे, दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा की एसआईटी ने जांच की थी और संबंधित अदालतों में आरोपपत्र दाखिल किए गए थे।
अदालत ने कहा कि एनएचआरसी ने भी हिंसा की जांच की थी और मई 2020 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। उसने कहा, “हमारे संज्ञान में बाद की कोई ऐसी घटना या सामग्री नहीं लाई गई है, जिससे पता चले कि इन याचिकाओं में बताए गए दिशा-निर्देशों का उल्लंघन जारी रहा या दोहराया गया। इसलिए हमारा सुविचारित मत है कि शैक्षणिक संस्थानों के भीतर होने वाले प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई को नियंत्रित करने के लिए नये दिशा-निर्देश तैयार करने की जरूरत नहीं है।