By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 07, 2026
नयी दिल्ली, सात अक्टूबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक मामले में कथित तौर पर तथ्यात्मक रूप से गलत बयान देने के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के पांच अधिकारियों के खिलाफ मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष झूठी गवाही की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति मधु जैन ने छह अक्टूबर को पारित आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया सीबीआई अधिकारियों और विशेष लोक अभियोजक ने 2016 में दाखिल एक जवाब को ‘‘तैयार करने, उसमें बदलाव करने, उसकी जांच, प्रक्रिया, मंजूरी या दाखिल करने’’ में हिस्सा लिया था। इस जवाब में आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में पूर्व आईआरएस अधिकारी के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई करने के लिए विधि मंत्रालय के साथ ‘पत्राचार’ होने का गलत दावा किया गया था, जबकि अधिकारियों को ‘वास्तविक स्थिति’ की जानकारी थी कि यह मामला एजेंसी के स्तर पर केवल आंतरिक विचार-विमर्श के चरण में था।
न्यायमूर्ति जैन ने अधिकारियों के खिलाफ अग्रवाल की याचिका पर झूठी गवाही की कार्रवाई करने से इनकार करने संबंधी निचली अदालत के आदेश को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सीबीआई को अपने आंतरिक प्रस्ताव को मंत्रालय के साथ पत्राचार के रूप में पेश करने का कोई अधिकार नहीं था। अदालत ने कहा कि मंत्रालय पहले ही यह राय दे चुका था कि उच्चतर मंच के समक्ष मामले को आगे बढ़ाने के लिए कोई उचित आधार नजर नहीं आता।
अदालत ने कहा, ‘‘वर्तमान मामले में जारी पत्राचार के संबंध में किए गए दावे का इस्तेमाल अपीलकर्ता के अनुरोध का विरोध करने और उसके दस्तावेजों को अपने पास बनाए रखने के लिए तथ्यात्मक आधार के रूप में किया गया। जवाब को तैयार करने, उसमें बदलाव करने, उसकी जांच, प्रक्रिया, मंजूरी और दाखिल करने से संबंधित कार्यों के साथ-साथ पूर्व के मसौदों और फाइल में दर्ज टिप्पणियों से सामने आई जानकारी प्रथम दृष्टया यह मानने का उचित आधार देती है कि संबंधित अधिकारियों ने ऐसे दावे को आगे बढ़ाने में भाग लिया, जिसके मौजूदा स्थिति के विपरीत होने की उन्हें जानकारी थी।’’ अदालत ने कहा कि अग्रवाल द्वारा विशेष न्यायाधीश के समक्ष दायर दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 340 के तहत आवेदन स्वीकार किया जाता है। अदालत ने विशेष न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वह सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मोहम्मद आजाद के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 191 के साथ धारा 193 तथा धारा 209 के तहत कथित अपराधों के लिए लिखित शिकायत दर्ज करें और फैसले की प्रति मिलने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर इसे संबंधित क्षेत्राधिकार वाली मजिस्ट्रेट अदालत को भेजें।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत इस मामले में स्वतंत्र रूप से कार्यवाही करेगी और उसके समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय की किसी टिप्पणी से प्रभावित नहीं होगी।