By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 01, 2026
नयी दिल्ली, एक अक्टूबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश पाने का कोई स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं है और न ही वह ऐसे अधिकार का कानूनी रूप से दावा कर सकता है। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि वैधानिक व्यवस्था के तहत वीजा होने मात्र से भारत में प्रवेश का पूर्ण और बिना शर्त अधिकार नहीं मिल जाता। न्यायमूर्ति अमित महाजन ने 30 सितंबर को पारित एक आदेश में कहा, ‘‘...वैधानिक व्यवस्था में ऐसी परिस्थितियों का स्पष्ट प्रावधान है जिनमें आवश्यक यात्रा दस्तावेज होने के बावजूद किसी विदेशी नागरिक को निर्दिष्ट आधारों पर भारत में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती।
याचिकाकर्ता ने उसके कारोबारी वीजा के आधार पर उसे भारत में प्रवेश की अनुमति देने का निर्देश दिए जाने का भी अनुरोध किया था। महिला ने कहा कि उसके पास वैध पासपोर्ट और कारोबारी वीजा था लेकिन इसके बावजूद उसे भारत में प्रवेश नहीं दिया गया और तुर्कमेनिस्तान वापस भेज दिया गया जबकि उसके साथ यात्रा कर रहे उसके पति को भारत में प्रवेश की अनुमति मिल गई थी। प्राधिकारियों ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि केवल वैध वीजा होने के आधार पर किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश का कोई निहित या ऐसा अधिकार नहीं मिलता जिसे छीना नहीं जा सके।
प्राधिकारियों के वकील ने दलील दी कि वीजा जारी किया जाना और भारत में प्रवेश की अनुमति मिलना दो अलग-अलग विषय हैं। उन्होंने कहा कि प्रवेश की अनुमति आव्रजन संबंधी वैधानिक व्यवस्था और सक्षम प्राधिकारियों को दी गई शक्तियों के अधीन होती है। वकील ने कहा कि महिला के संबंध में प्रतिकूल सूचनाएं मिली थीं जिसके बाद सक्षम आव्रजन प्राधिकारी ने यह निर्णय लिया कि उसे भारत में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में लिया गया। प्राधिकारियों द्वारा रिकॉर्ड पर रखे गए दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद अदालत ने कहा कि महिला द्वारा उसके माता-पिता और पति के बारे में दिए गए विवरण में विसंगति थी। अदालत ने यह भी गौर किया कि यात्रा के उद्देश्य के संबंध में उसके पास न तो कोई ‘बिजनेस कार्ड’ था और न ही कोई निमंत्रण पत्र।
वह अपने देश में अपने कारोबार से संबंधित विवरण भी नहीं दे सकी और कारोबारी वीजा हासिल करने के बावजूद उसने खुद को ‘गृहिणी’ बताया था।