By नीरज कुमार दुबे | Jul 29, 2026
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में "चलो संसद" मार्च के दौरान पुलिसकर्मियों पर हुए हिंसक हमलों का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। ड्यूटी के दौरान गंभीर रूप से घायल हुए दिल्ली पुलिस के चार कर्मियों के परिजनों ने सर्वोच्च न्यायालय में हस्तक्षेप याचिका दायर कर उन लोगों की जवाबदेही तय करने की मांग की है, जिन्होंने पुलिस बल पर हमले किए। साथ ही, उन्होंने अदालत से यह भी आग्रह किया है कि कानून-व्यवस्था संभालने के दौरान पुलिसकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
याचिका के अनुसार, 20 से 25 जुलाई के बीच जंतर-मंतर और नई दिल्ली के अन्य इलाकों में लगभग 20 से 30 हजार लोगों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए करीब तीन हजार पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। इसी दौरान पुलिस बल पर कांच की बोतलों, पत्थरों और फुटपाथ से उखाड़ी गई टाइलों से हमला किया गया। आरोप है कि कई टाइलों को जमीन पर घिसकर धारदार बना दिया गया ताकि पुलिसकर्मियों को गंभीर चोट पहुंचाई जा सके। याचिका में इसे कानून-व्यवस्था संभाल रहे सुरक्षा बलों पर सुनियोजित और खतरनाक हमला बताया गया है।
सब-इंस्पेक्टर संदीप कुमार के बारे में याचिका में कहा गया है कि 25 जुलाई की हिंसा के दौरान उन्हें भीड़ से अलग कर डंडों और पत्थरों से बेरहमी से पीटा गया। उनके शरीर पर जूतों के निशान मिले और सिर पर कई गंभीर चोटें आईं, जिनके लिए तत्काल टांके लगाने पड़े। एसीपी कैलाश सिंह बिष्ट के सिर में पांच सेंटीमीटर लंबा गहरा घाव हुआ और उन्हें तत्काल राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाना पड़ा। एएसआई हमेंदर राठी के चेहरे की दो हड्डियां टूट गईं तथा कूल्हे के पास हेयरलाइन फ्रैक्चर हुआ, जबकि कांस्टेबल धीरज को सिर में गंभीर चोट और अन्य शारीरिक क्षति पहुंची।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि पुलिस पर हमले के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही यह भी घोषित किया जाए कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत ड्यूटी निभा रहे पुलिसकर्मी भी समान रूप से सुरक्षा और जीवन के अधिकार के हकदार हैं। याचिका में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि हिंसा करने, वैध आदेशों की अवहेलना करने और वर्दीधारी महिला-पुरुषों पर हमला करने का किसी को कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
हम आपको बता दें कि यह मामला उन याचिकाओं के साथ सुना जाएगा, जिनमें प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित सख्ती पर सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में अब सर्वोच्च न्यायालय के सामने दोनों पक्षों यानि प्रदर्शनकारियों और घायल पुलिसकर्मियों की दलीलें एक साथ आएंगी।
इधर, इस पूरे घटनाक्रम के बाद दिल्ली पुलिस के सेवानिवृत्त अधिकारियों और कर्मचारियों ने भी घायल जवानों के समर्थन में मोर्चा खोल दिया है। दिल्ली पुलिस महासंघ ने 31 जुलाई को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरने की अनुमति मांगी है। संगठन का कहना है कि धरने का उद्देश्य ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के साथ एकजुटता दिखाना, उनका मनोबल बढ़ाना और हिंसा व तोड़फोड़ में शामिल तत्वों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग करना है।
महासंघ ने स्पष्ट किया है कि उसका विरोध शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जिन्होंने पथराव, हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ और पुलिस पर हमले किए। संगठन ने आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित धरना पूरी तरह शांतिपूर्ण होगा तथा सभी कानूनी और प्रशासनिक निर्देशों का पालन किया जाएगा।
देखा जाये तो लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन हिंसा, पथराव और वर्दीधारी सुरक्षा बलों पर हमला किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है। कानून का पालन करवाने वाले पुलिसकर्मी यदि स्वयं असुरक्षित महसूस करेंगे, तो कानून-व्यवस्था की पूरी व्यवस्था प्रभावित होगी। इसलिए दोषियों के खिलाफ निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई के साथ-साथ ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की सुरक्षा, सम्मान और मनोबल को सर्वोच्च प्राथमिकता देना न केवल प्रशासनिक आवश्यकता है, बल्कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की भी अनिवार्य शर्त है।