By नीरज कुमार दुबे | Sep 25, 2026
नई दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चल रही कवायद के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरी प्रक्रिया पर फिर से बहस तेज कर दी है। हम आपको बता दें कि जिन प्रमुख और चर्चित मतदाताओं के नाम पर एसआईआर के दौरान नोटिस जारी हुए थे, उनमें से अधिकांश के विवरण और दस्तावेजों का सत्यापन अब पूरा कर लिया गया है और उन्हें अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के लिए हरी झंडी मिल गई है। इनमें पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस जयशंकर, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे चर्चित नाम शामिल हैं।
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दरअसल, इन चर्चित नामों को नोटिस मिलने के बाद सवाल उठने लगे थे कि आखिर ऐसे लोगों के नाम भी एसआईआर की जांच के दायरे में कैसे आ गए? चुनाव अधिकारियों का कहना है कि मतदाता विवरण में कुछ तार्किक विसंगतियां मिली थीं या फिर मौजूदा विवरण पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े अभिलेखों से मेल नहीं खा रहा था। इसी आधार पर संबंधित मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए। अधिकारियों के मुताबिक नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता सूची से नाम काटे जाने का संकेत नहीं है, बल्कि यह संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने का अवसर देता है।
लेकिन असली सवाल यहीं से पैदा होता है। दिल्ली में एसआईआर के तहत करीब 33 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई है। यानी यह प्रक्रिया केवल कुछ चर्चित चेहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर लाखों आम मतदाताओं पर पड़ रहा है। नोटिस जारी होने के बाद आम मतदाता को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी पात्रता और विवरण साबित करने के लिए दस्तावेज जुटाने पड़ रहे हैं। दूसरी तरफ चर्चित और प्रभावशाली लोगों के मामलों में अधिकारियों द्वारा संपर्क कर दस्तावेज जुटाने और सत्यापन पूरा करने की प्रक्रिया सामने आई है।
यही अंतर अब एसआईआर की पूरी कवायद के केंद्र में आ गया है। कुछ रिपोर्टों में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली के एसआईआर में अधिकारियों के स्तर पर वीआईपी मतदाताओं की पहचान कर उनके सत्यापन के लिए अलग तरह की सुविधा उपलब्ध कराई गई। इन रिपोर्टों के अनुसार सामान्य मतदाताओं को जहां नोटिस के बाद सुनवाई और दस्तावेजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है, वहीं प्रभावशाली मतदाताओं के मामलों में प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान रही। यह आरोप चुनावी प्रक्रिया की समानता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
हालांकि चुनाव अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष यह है कि नोटिस जारी करने का आधार मतदाता के पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि एसआईआर के दौरान सामने आई विसंगतियां हैं और सभी मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत सत्यापन किया जा रहा है। हम आपको बता दें कि अंतिम मतदाता सूची चार नवंबर को प्रकाशित की जानी है, जबकि नोटिसों के निस्तारण की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक पूरी की जानी है।
इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि जिन चर्चित मतदाताओं के नाम एसआईआर के दौरान सवालों के घेरे में आए, वे सत्यापन के बाद अंतिम सूची में जगह पाने की स्थिति में हैं। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि लाखों आम मतदाताओं के मामलों का निस्तारण किस गति और किस समान प्रक्रिया के तहत होता है और चार नवंबर को प्रकाशित होने वाली अंतिम सूची एसआईआर को लेकर उठे सवालों का कितना स्पष्ट जवाब देती है। बहरहाल, इतना तो दिख ही रहा है कि चुनाव आयोग की ओर से आम और खास में फर्क किया जा रहा है।
-नीरज कुमार दुबे