By अशोक भाटिया | Oct 15, 2026
भारतीय लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंभा उसकी निष्पक्ष चुनाव प्रणाली रही है। वैश्विक पटल पर जब भी भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की मिसाल दी जाती है, तो निर्वाचन सदन यानी भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका को अग्रिम पंक्ति में रखा जाता है। किंतु, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर वर्तमान में जो अभूतपूर्व राजनीतिक और संवैधानिक गतिरोध पैदा हुआ है, उसने इस प्रतिष्ठित संस्था की निष्पक्षता को इतिहास के सबसे गंभीर दोराहे पर ला खड़ा किया है। देश की राजनीति इस समय इस सवाल को लेकर सुलग रही है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगना कांग्रेस और समूचे विपक्ष की एक सैद्धांतिक लड़ाई है, या फिर यह उनकी सोची-समझी राजनीतिक विवशता और नैरेटिव सेट करने की मजबूरी का हिस्सा है? केरल विधानसभा द्वारा देश के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए प्रस्ताव पारित करना और कांग्रेस द्वारा सड़कों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मोर्चा खोलना यह दर्शाता है कि यह विवाद महज एक प्रशासनिक विसंगति नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक संग्राम का रूप ले चुका है।
इस विवाद की शुरुआत 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक खोजी रिपोर्ट से हुई, जिसने निर्वाचन आयोग के भीतर के बंद दरवाजों के मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण यानी 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' को लेकर आयोग के भीतर ही गहरा बिखराव था। दावा किया गया कि अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में मतदाता सूची से नाम हटाने, नए नाम जोड़ने और डेटा प्रबंधन की प्रक्रियाओं पर करीब 14 बार औपचारिक और लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। लोकतंत्र का स्थापित नियम और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस यह स्पष्ट करती हैं कि निर्वाचन आयोग में कोई भी निर्णय बहुमत या सर्वसम्मति से होना चाहिए। विपक्ष का सीधा आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य आयुक्तों की चिंताओं और आपत्तियों को दरकिनार करते हुए एकतरफा फैसले लिए। जब किसी संवैधानिक संस्था के भीतर ही इस स्तर का आंतरिक असंतोष और अविश्वास सतह पर आ जाए, तो उसकी साख पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है।