By दिव्यांशी भदौरिया | Aug 13, 2026
बरसात के समय डेंगू का जोखिम अधिक बढ़ जाता है। डेंगू का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छे परेशान हो जाते हैं। इसको लेकर प्लेटलेट्स कम होने की चिंता सताने लगती है। इस बीमारी में प्लेटलेट्स का घटना आम बात है, लेकिन हर मरीज में इसकी स्थिति एक जैसी नहीं होती है। अक्सर प्लेटलेट्स कम होने के बाद मरीज की हालत सामान्य रहती है, बल्कि कुछ मामलों में दूसरे लक्षण ज्यादा गंभीर करते हैं।
डेंगू में प्लेटलेट्स कब गिरती है?
असल में डेंगू की शुरुआत में तेज बुखार 2 से 7 दिनों तक रहता है। बीमारी के तीसरे से सातवें दिन के आसपास, खासकर जब बुखार कम होने लगता है, क्रिटिकल फेज शुरु हो सकता है। इसी दौरान प्लेटलेट काउंट तेजी से गिर जाती है। WHO के मुताबिक, वाइट रक्त कोशिकाओं में कभी के बाद प्लेटलेट्स में तेजी से गिरावट देखी जाती है।
अगर आप डेंगू को सिर्फ एक प्लेटलेट रिपोर्ट देखकर खतरे का अनुमान लगाना सही नहीं है। डॉक्टर प्लेटलेट्स के साथ हीमेटोक्रिट (HCT), ब्लड प्रेशर, नाड़ी, पेशाब की मात्रा, शरीर में पानी की स्थिति और मरीज के लक्षणों को भी देखते हैं। प्लेटलेट्स तेजी से गिरने के साथ ही हीमेटोक्रिट बढ़ना प्लाज्मा लीकेज की ओर इशारा करता है।
कितनी प्लेटलेट्स कम होना चिंता की बात
यदि प्लेटलेट्स लगातार तेजी से गिर रही हैं या साथ में ब्लीडिंग , लो ब्लड प्रेशर, सांस लेने में परेशानी या अधिक कमजोरी जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं, ऐसे में तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरुरी है।
इन लक्षणों के बाद तुरंत डॉक्टर को दिखाएं
- तेज या काफी से लगातार पेट दर्द होना
- बार-बार या लगातार उल्टी होना
- मसूड़ों या नाक से खून आना
- उल्टी या मल में खून
- अक्सर सांस तेजी से चलना या सांस लेने में परेशानी
- बहुत ज्यादा कमजोरी, सुस्ती या बैचेनी
- अत्यधिक प्यास लगना
- त्वचा का पीला, ठंडा या चिपचिपा पड़ना
- शरीर में पानी जमा होने के संकेत
प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए क्या करें?
अगर डेंगू में प्लेटलेट्स अधिक बढ़ गई हैं, तो मरीज को डॉक्टर की सलाह के अनुसार पर्याप्त तरल पदार्थ और आराम देना महत्वपूर्ण है। डिहाड्रेशन से बचने के लिए पानी, ORS और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए तरल पदार्थ का सेवन करना उचित माना जाता है।
वहीं, पपीते के पत्ते या दूसरे घरेलू नुस्खों को प्लेटलेट्स बढ़ाने का प्रमाणित इलाज मानकर डॉक्टर की निगरानी को नजरअंदाज नहीं करें। प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन भी हर ऐसे मरीज को सिर्फ कम प्लेटलेट काउंट के आधार पर नहीं दिया जाता है, इसका निर्णय डॉक्टर मरीज की पूरी स्थिति और ब्लीडिंग के जोखिम को देखकर किया जाता है।