By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 12, 2026
(विक्रम निरंजन, यूनिवर्सिटी ऑफ लिमरिक) लिमरिक (आयरलैंड), 12 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) किसी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का आकलन करने के लिए दांतों की सेहत भले ही पहला पैमाना न लगे, लेकिन इससे स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं। दांतों में सड़न, मसूड़ों की बीमारी और दांतों का गिरना दुनिया भर में आम दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल हैं। ये समस्याएं अक्सर यह भी बताती हैं कि कोई स्वास्थ्य प्रणाली बीमारियों की रोकथाम को कितनी प्राथमिकता देती है। एक दंत चिकित्सक और शोधकर्ता के रूप में मेरा अनुभव है कि मुंह से जुड़ी बीमारियां शायद ही कभी केवल एक खराब दांत तक सीमित होती हैं। इनके पीछे अक्सर पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की भूमिका होती है। समय रहते बीमारी की रोकथाम कैसे की जाती है, समस्याओं का पता कब चलता है और लोगों को बिना देरी इलाज मिल पाता है या नहीं, ये सभी महत्वपूर्ण सवाल हैं। इसी लिहाज से इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना दिलचस्प है। दोनों समृद्ध यूरोपीय देश हैं और कल्याणकारी व्यवस्था की मजबूत परंपरा रखते हैं, लेकिन उनकी दंत चिकित्सा प्रणालियां अलग-अलग तरीके से काम करती हैं।
----- वयस्कों के दांतों की स्थिति ----- वयस्कों में भी दोनों देशों के बीच अंतर दिखाई देता है। डेनमार्क में नियमित रूप से दंत चिकित्सक के पास जाना आम है, खासकर बुजुर्गों में। लंबे समय से किए जा रहे सर्वेक्षणों से पता चलता है कि कई लोग दांतों की जांच को अपने समग्र स्वास्थ्य की देखभाल का नियमित हिस्सा मानते हैं। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्षों तक दांतों की जांच नहीं कराने से मसूड़ों की बीमारी, दांतों का गिरना और अधिक जटिल उपचार की जरूरत जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इंग्लैंड में दंत चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच अधिक असमान है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 65 प्रतिशत वयस्कों ने दो साल की अवधि में एनएचएस के दंत चिकित्सक से उपचार लिया। इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी 35 प्रतिशत वयस्कों को कोई इलाज नहीं मिला। इनमें से कुछ लोग निजी दंत चिकित्सकों से उपचार कराते हैं। हालांकि, यह आंकड़ा बताता है कि कई लोगों के लिए एनएचएस के तहत दंत चिकित्सा सेवा हासिल करना कितना मुश्किल हो गया है। डेनमार्क में व्यवस्था नियमित जांच को प्रोत्साहित करती है, जबकि इंग्लैंड में कई लोगों के लिए दंत चिकित्सक से मिलने का समय हासिल करना ही अनिश्चित हो गया है। इससे लोगों में निराशा बढ़ती है और उन लोगों की मुंख संबंधी सेहत धीरे-धीरे खराब होने का जोखिम रहता है, जो निजी इलाज का खर्च उठाने या बार-बार अपॉइंटमेंट लेने की कोशिश करने में सक्षम नहीं हैं। दांतों की बीमारियां केवल जैविक कारणों से नहीं होतीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियां भी इन्हें प्रभावित करती हैं। इसलिए आर्थिक और व्यावहारिक बाधाओं का सामना करने वाले लोगों में इन बीमारियों का खतरा अधिक होता है।
----- स्वास्थ्य व्यवस्था किस चीज को प्राथमिकता देती है ----- इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना से एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि दंत चिकित्सा व्यवस्था उसी दिशा में काम करती है, जिसके लिए उसे तैयार किया गया है। डेनमार्क में बच्चों को सरकारी वित्तपोषण से दंत चिकित्सा सेवाएं मिलती हैं, जबकि वयस्कों के लिए सब्सिडी वाली व्यवस्था है। इससे नियमित जांच, इलाज में निरंतरता और बीमारी की रोकथाम को प्रोत्साहन मिलता है। यह व्यवस्था पूरी तरह दोषरहित नहीं है, लेकिन इसका जोर लोगों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने पर है। इंग्लैंड में एनएचएस के तहत दंत चिकित्सा सेवाएं सभी के लिए उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। हालांकि, इसकी भुगतान व्यवस्था को लेकर अक्सर यह आलोचना होती रही है कि इसमें बीमारी की रोकथाम की तुलना में इलाज का पूरा चरण समाप्त करने को अधिक प्रोत्साहन मिलता है। महामारी के बाद सेवाओं तक पहुंच बेहतर बनाने और व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ‘एनएचएस डेंटल रिकवरी प्लान’ शुरू किया गया था। इसके बावजूद दंत चिकित्सा सेवाओं पर दबाव, असमान पहुंच और नए एनएचएस मरीजों को स्वीकार करने में कई क्लीनिकों की असमर्थता की समस्या बनी हुई है। दोनों देशों की व्यवस्थाओं में प्रोत्साहन के तरीके अलग हैं और इससे यह तय होता है कि मरीजों को किस तरह की सेवाएं मिलती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में इन प्रोत्साहनों की अहम भूमिका होती है।
----- फ्लोराइड और बीमारी की रोकथाम ----- फ्लोराइड इसका एक सरल उदाहरण है कि अलग-अलग स्वास्थ्य प्रणालियां दांतों की सड़न रोकने के लिए किस तरह काम करती हैं। इंग्लैंड में लगभग 10 प्रतिशत लोगों को फ्लोराइड युक्त पानी मिलता है। साक्ष्य बताते हैं कि पानी में फ्लोराइड मिलाने से बच्चों के दांतों में सड़न कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी उपलब्धता सभी क्षेत्रों में समान नहीं है। डेनमार्क में पानी में फ्लोराइड नहीं मिलाया जाता। वहां फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट, दंत चिकित्सकों द्वारा फ्लोराइड का इस्तेमाल और नियमित निवारक देखभाल पर जोर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, बच्चों के दांतों पर फ्लोराइड वार्निश की परत लगाई जाती है, जिससे दांतों को सड़न से बचाने में मदद मिलती है। इससे मिलने वाला महत्वपूर्ण सबक यह है कि फ्लोराइड तब अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकता है, जब उसे ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए, जो लोगों तक समय रहते और लगातार पहुंचती हो। दांतों की बीमारियों का आर्थिक बोझ भी काफी बड़ा है। इसलिए यह मायने रखता है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर पैसा कब और किस उद्देश्य से खर्च किया जाता है। खर्च का एक बड़ा हिस्सा बीमारी की रोकथाम पर समय रहते किया जाना चाहिए। डेनमार्क बच्चों पर विशेष ध्यान देते हुए शुरुआती चरण में निवेश करता है। ब्रिटेन भी स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ी रकम खर्च करता है, लेकिन वहां बीमारी बढ़ने के बाद इलाज, दांत निकालने और समय पर रोकथाम नहीं होने से पैदा होने वाली समस्याओं पर अधिक खर्च करना पड़ता है। दांतों की सेहत से यह समझने में मदद मिलती है कि कोई स्वास्थ्य व्यवस्था बीमारी की रोकथाम को कितना महत्व देती है और क्या लोग इलाज तक पहुंच को लेकर भरोसा कर सकते हैं। इसीलिए इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना महत्वपूर्ण है। दोनों देशों में बीमारी की रोकथाम के तरीके अलग हैं। डेनमार्क जहां समस्याओं का शुरुआती चरण में पता लगाने और उनका उपचार करने पर अधिक जोर देता है, वहीं इंग्लैंड में अक्सर तब कार्रवाई करनी पड़ती है, जब बीमारी गंभीर रूप ले चुकी होती है।