विकसित देश भारत के आर्थिक दर्शन को लागू कर अपनी आर्थिक समस्याओं का हल निकाल सकते हैं

By प्रह्लाद सबनानी | Apr 22, 2024

विश्व के कुछ विकसित देश, विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन, भारत को समय समय पर आर्थिक क्षेत्र में अपना ज्ञान प्रदान करते रहे हैं। परंतु, अब विश्व के आर्थिक धरातल पर परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और भारत की स्थिति इस संदर्भ में बहुत सुदृढ़ होती जा रही है वहीं विकसित देशों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। अमेरिका स्थित निवेश बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थान भारत के कुल कर्ज की स्थिति पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहते रहे हैं कि भारत का कर्ज, सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में, तेजी से बढ़ता जा रहा है। जबकि, इसी मापदंड के आधार पर अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों की स्थिति देखी जाय तो भारत की तुलना में इन देशों की स्थिति बहुत अधिक दयनीय स्थिति में पहुंच गई है, परंतु यह देश भारत को आज भी ज्ञान देते नहीं चूकते हैं कि भारत अपनी स्थिति में किस प्रकार सुधार करे।

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आज अमेरिका द्वारा अन्य देशों को ज्ञान देने के बजाय अपनी लगातार गर्त में जा रही अर्थव्यवस्था को सम्हालने के प्रयास करने चाहिए। अमेरिकी सरकार को अपने खर्चों पर नियंत्रण करते हुए अपने आय के साधनों को बढ़ाना चाहिए। न कि, भारत एवं अन्य विकासशील देशों को सीख दे कि ये देश अपने देश में किसानों को दी जा रही सब्सिडी/सुविधाओं में कटौती करें और अंतरराष्ट्रीय व्यापार करते समय अमेरिका द्वारा दी गई सलाह को ध्यान में रखें। आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था की जो स्थिति है और विश्व के अन्य देश यदि अमेरिकी सलाह के अनुसार अपनी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू करते हैं तो सम्भव है कि इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी संकट के बादल मंडराने लगें। अमेरिका में पूंजीवाद पर आधारित अर्थव्यवस्था अब अंतिम सांसे लेती दिखाई दे रही है। यदि शीघ्र ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नहीं सम्हाला गया तो कई अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।

भारत में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या को लेकर भी पश्चिमी जगत अपनी चिंता व्यक्त करता रहता है। हाल ही में ब्रिटेन के एक सांसद ने इस सम्बंध में अपनी राय प्रकट करते हुए कहा है कि भारत को गरीबों की संख्या को कम करने हेतु कुछ विशेष उपाय करने चाहिए। इस प्रकार की सलाह देने वाले विदेशी नागरिक यह भूल जाते हैं कि पिछले 10 वर्षों के दौरान भारत में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले नागरिकों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है और अब यह लगभग 10 प्रतिशत तक रह गई है। जब ब्रिटेन ने वर्ष 1947 में भारत छोड़ा था तब भारत को अति गरीब देश बनाकर छोड़ा था और भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही थी। और, आज ब्रिटेन में ही लगभग 18 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। फिर, किस आधार पर ब्रिटेन एवं अन्य विकसित देशों के नागरिक, आर्थिक क्षेत्र में, भारत को सलाह देने लगते हैं। जबकि, भारतीय अर्थव्यवस्था चूंकि सनातन चिंतन पर आधारित आर्थिक नियमों का अनुपालन करते हुए आगे बढ़ रही है इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था आज इन देशों की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई दे रही हैं। विकसित देशों को यदि अपनी आर्थिक समस्याओं को हल करना है तो साम्यवाद एवं पूंजीवाद पर आधारित आर्थिक नीतियों का परित्याग कर भारतीय आर्थिक दर्शन को अपनाकर अपनी आर्थिक समस्याओं का हल निकालने का प्रयास करना चाहिए, न कि समय समय अन्य देशों को इस सम्बंध में अपना ज्ञान बांटना चाहिए।

- प्रहलाद सबनानी

सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर - 474 009

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