विकसित परम्परा.... वृक्षारोपण (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jul 06, 2024

गरमी के मौसम में, पारम्परिक और नियमित फायर सीज़न खत्म होने और मानसून की शुरुआत के बाद, वन विभाग का वृक्षारोपण समारोह कई महीने तक चलता रहता है। कहीं कहीं तो दस हज़ार हेक्टेयर भूमि पर सवा करोड़ पौधे लगाए जाने की महान लोकतान्त्रिक घोषणा होती है। घोषणा होते ही साफ़ हो जाता है कि दो शब्द, ‘दस हज़ार’ गलती से कहे, लिखे या टाइप हो गए। जल्दबाजी में लिया गया यह निर्णय शानदार तो लगता है। ‘सवा’ शब्द हमारी संस्कृति में वैसे भी शुभ माना जाता है। वह बात दीगर है कि लक्ष्य अलग चीज़ होती है और संकल्प अलग। लक्ष्य नरम वस्तु होती है और संकल्प कठोर। 

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मंत्रीजी अक्सर बहुत सख्त निर्णय लेते हैं। कहा इस बार वृक्षारोपण की रिपोर्ट ऑनलाइन की और ली जाएगी ताकि घपला न हो। उन्होंने अपने सामुदायिक भवन में महंगे पौधे अलग से लगाए। पिछली सरकार में विपक्ष में होते हुए, अपने पुराने भाषणों को बिलकुल भुलाकर हाथ उठाकर बोले, विकास के नाम पर शहरों, कस्बों और गाँवों में दिन रात फैलते कंक्रीट के जंगलों पर सख्ती से रोक लगानी ही होगी। यहां वहां लगे वृक्षों को काटने वालों को अविलम्ब क़ानून के हवाले करना होगा। आम लोगों के बिगड़ते स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, दिन रात बढ़ते ध्वनि प्रदूषण से परेशान हूं इसलिए सिर्फ बातें करने से कुछ न होगा। ज्यादा ठोस कदम उठाने होंगे। अब सम्बंधित लोगों को पर्यावरण के लिए सिर्फ संकल्प नहीं बलिक अपने दिमाग का कायाकल्प करना होगा।  

सम्बंधित विभाग द्वारा जारी ज़ोरदार प्रेस रिलीज़ का आशय रहा कि नेताजी के सशक्त मार्गदर्शन में चारों दिशाओं में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण, भूमि संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र बहाली , हरित प्रौद्योगिकी और स्वच्छ जल पारिस्थितिकी आदि बिन्दुओं पर खूब जोर देकर पर्यावरण को बदल डालने का अभियान रातों रात शुरू कर दिया है।  

नेताजी वृक्षारोपण समारोह में बार बार मुख्य अतिथि बनकर तंग आ जाते हैं तो संजीदगी से सोचने लगते हैं कि वास्तव में हम सब मिलकर, दुनिया को खत्म करने के अभियान में जुटे हुए हैं। क्यूं न इतनी मेहनत करने के बजाए नकली फूल और पौधे सजाने का अभियान शुरू किया जाए। यह व्यवसाय निश्चय ही खूब फले फूलेगा। उनकी पत्नी ने भी असली और नकली फूल पौधों का बढ़िया मिलन करा रखा है। दूर से पता नहीं चलता कि असली है या नकली।

इस तरह भी वृक्षारोपण की विकसित परम्परा और समृद्ध हो सकती है। नया सोचने में क्या हर्ज़ है।

- संतोष उत्सुक

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