By संतोष उत्सुक | Jan 14, 2022
सर्दी के मौसम में यह खुशखबर जोश भरने वाली है। महानता जैसी महत्त्वपूर्ण चीज़ फैल रही है। प्राचीन काल में तो महान लोग सकुचाए रहते थे। वे चाहते हुए भी नहीं चाहते थे कि कोई उन्हें महान कहे, उन्हें पुष्प भेंट करे उन्हें किसी मंच पर सम्मानित करे। अब नए दौर में विकास के साथ हर चीज़ विकसित हो रही है, बढ़ रही है। इनमें से महानता भी एक है लेकिन यह अब एक वस्तु की तरह हो गई है। सम्प्रेषण ने अपना राज्य इतना फैला दिया है कि महान शब्द महानता के स्तर से भी आगे जा पहुंचा है वह बात दीगर है कि संवाद परेशान हैं, संवेदना दुखी है और ज़िंदगी का बेचारा दर्द कोने में बैठ कर रो रहा है। सच, जो कभी अपनी शान में रहता था पता नहीं कहां अपना पूरा शरीर छिपाए बैठा है। उसे डर है कहीं उसे बार झूठ के प्रकाश का सामना न करना पड़े क्यूंकि झूठ भी महानता में प्रवेश कर गया है।
किसी फैसले के खिलाफ होते हुए भी, चुप रहने से महानता जैसी भावना उगाई जा सकती है। अब महामारी की बहन के स्वागत में कुछ लोग पुन सार्वजनिक रूप से सेवा, मदद करेंगे। छ लोग, चार मास्क पकड़ाएंगे और अखबार में फोटो खबर छपने पर अपने शरीर में महानता का प्रवेश अनुभव करेंगे। वे कहेंगे हमने मदद तो बहुत की लेकिन किसी को बताया नहीं, कभी अखबार में इंटरव्यू नहीं दिया। फिर इंटरव्यू होने लगा तो बता ही देंगे कि बताना सही नहीं समझते, लीजिए हो गए न महानता के पथ पर अग्रसर। अनुशासन तोड़कर महानता की जिस नदी में डुबकी लगाई जाती है उसका आनंद निर्मल है। मना करने के बावजूद बंदरों और आवारा कुत्तों को कुछ खिलाकर, निजी कुत्तों को पार्क या सड़क किनारे घुमाकर कहीं भी उनका पेट खाली कराकर पशु प्रेमी होने की मानवीय महानता महसूस होने लगती है।
हर कोई महानता का कम्बल चाहता है लेकिन सब उनके जैसे होना चाहते हैं कोई हमारे जैसा या इनके जैसा नहीं होना चाहता। महान बनाने वाले तत्वों ने सभी की हाथ खोलकर हमेशा मदद की है। इस विषय पर बदले हुए युग में बहुत संजीदा कार्य होने लगा है। महानता के छोटे छोटे आउटलेट्स खुल गए हैं जहां आसानी से आकर्षक पैकिंग में महानता उपलब्ध है। महान महसूस करना वाकई अदभुत विचार है।
- संतोष उत्सुक