By नीरज कुमार दुबे | Jul 27, 2026
भारतीय राजनीति में संदेश अक्सर शब्दों से नहीं, बल्कि प्रतीकों से दिए जाते हैं। संसद के मॉनसून सत्र में आज ऐसा ही एक प्रतीकात्मक दृश्य देखने को मिला। दो दिन पहले नीट पेपर लीक विवाद की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले धर्मेंद्र प्रधान जब संसद पहुंचे तो बीजेपी और एनडीए सांसदों ने उनका स्वागत विजेता की तरह किया। "धर्मेंद्र प्रधान जिंदाबाद" के नारों से संसद परिसर गूंज उठा, पारंपरिक टोपी और शॉल पहनाकर उनका अभिनंदन किया गया और मुस्कुराते हुए प्रधान ने हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन स्वीकार किया।
हालांकि बीजेपी के लिए धर्मेंद्र प्रधान केवल पूर्व शिक्षा मंत्री नहीं हैं। वह पार्टी के सबसे भरोसेमंद संगठनकर्ताओं में गिने जाते हैं। ओडिशा के एक राजनीतिक परिवार में जन्मे प्रधान ने छात्र राजनीति से शुरुआत की थी। एबीवीपी के कार्यकर्ता से लेकर भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, विधायक, सांसद और फिर केंद्रीय मंत्री बनने तक का उनका सफर संगठन की सीढ़ियां चढ़ते हुए तय हुआ। पेट्रोलियम मंत्री रहते हुए उज्ज्वला जैसी योजनाओं के विस्तार में उनकी अहम भूमिका रही, जबकि 2021 में उन्हें शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई।
ओडिशा में बीजेपी का संगठन खड़ा करने का श्रेय भी काफी हद तक धर्मेंद्र प्रधान को दिया जाता है। 2017 के पंचायत चुनावों से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव और फिर 2024 में बीजेडी को सत्ता से बेदखल कर बीजेपी की ऐतिहासिक जीत तक, उनकी रणनीति निर्णायक मानी जाती है। अमित शाह के करीबी राजनीतिक प्रबंधकों में उनकी गिनती होती रही है। पार्टी के भीतर उन्हें करिश्माई वक्ता से ज्यादा भरोसेमंद रणनीतिकार और संकटमोचक के रूप में देखा जाता है।
लेकिन शिक्षा मंत्रालय का कार्यकाल उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन अध्याय साबित हुआ। नई शिक्षा नीति, मातृभाषा आधारित शिक्षा और पीएम-श्री स्कूल जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाने के बावजूद उनका कार्यकाल लगातार विवादों में घिरा रहा। राष्ट्रीय परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोप, एनटीए की कार्यप्रणाली पर सवाल, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, तमिलनाडु के साथ तीन-भाषा फार्मूले पर टकराव, 'हिंदी थोपने' के आरोप और शिक्षा संस्थानों के कथित भगवाकरण को लेकर विपक्ष के हमले लगातार उनका पीछा करते रहे। अंततः नीट विवाद वही मोड़ बन गया जिसने उन्हें पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
देखा जाये तो संसद में धर्मेंद्र प्रधान को मिले सम्मान ने यह संकेत भी दे दिया कि भाजपा उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ने नहीं देना चाहती। माना जा रहा है कि उन्हें जल्द ही पार्टी संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष या महासचिव पद की जिम्मेदारी देने के अलावा उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी भी बनाया जा सकता है।
बहरहाल, सभी को यह समझना होगा कि भारतीय जनता पार्टी शायद उन पुराने कॉलेजों की तरह नहीं है, जहां लकड़ी की बेंचों पर सिर्फ लोकप्रिय नारे लिखे मिलते हैं। उसकी राजनीतिक शिक्षा सत्ता के कठिन संघर्षों से हुई है, जहां आज से ज्यादा कल की चिंता होती है। शायद इसी वजह से पार्टी ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अंत नहीं, बल्कि अगले अध्याय की शुरुआत की तरह पेश किया है। अब असली सवाल यह है कि क्या संसद में गूंजे धर्मेंद्र प्रधान "जिंदाबाद" के नारे जनता के मन में उठे उन सवालों को भी दबा पाएंगे, जो लाखों छात्रों के भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता से जुड़े हैं?
-नीरज कुमार दुबे