संदर्भ धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र- छात्रों से संवाद की ओर बढ़ते कदम

By डॉ. प्रवीण दाताराम | Jul 28, 2026

देश के प्रधानमत्री ने देश की अंदरूनी शान्ति के लिए या आगे किसी बड़े लक्ष्य को साधने के लिए ऐसी फॉरेन फंडेड, फॉरेन लेंग्वेज्ड, फॉरेन फीडेड, फॉरेन माइंडेड और निर्लज्ज शक्तियों के आगे समर्पण कर दिया है। स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए और समय की संवेदनशीलता को दृष्टिगत रखते हुए उनका यह कदम बड़प्पन से परिपूर्ण कदम तो है किंतु, दीर्घकालिक दृष्टि से है तो यह गलत ही। इसके परिणामों के प्रति देश को अभी से सचेत होना होगा। 

यह भी सही है कि धर्मेन्द्र प्रधान जी का त्यागपत्र कराना ही था तो UGC के समय ही करा लेना था। वह सही समय था। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का यह समय ठीक नहीं है। 

आद. प्रधानमंत्री जी ने धर्मेंद्र जी प्रधान से त्यागपत्र लेकर किसी शेर की भांति एक कदम पीछे लिया है तो किसी दीर्घकालिक एजेंडे की रक्षा और पूर्ति के लिए ही किया होगा। निश्चित ही उन्होंने संघशक्ति की प्रेरणा से यह कदम राष्ट्रहित में ही उठाया होगा। 

इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े इस आंदोलन के सैकड़ों वीडियो देखिए, फिर सोचिए। फिर अपने आसपास के छात्रों को अवश्य देखिए। अपने नगर के सैकड़ों छोटे-बड़े सभी कालेज के विद्यार्थियों का बारीकी से चुपचाप परीक्षण और अध्ययन कीजिए। इसके बाद सोचिए और बताइये कि इस वीडियो में जो हैं, क्या वे विद्यार्थी हैं? और यदि हैं भी तो क्या ऐसे विद्यार्थियों के दबाव में देश की सत्ता को आना चाहिए? मोदी जी हों या कोई किसी अन्य दल के कोई और प्रधानमंत्री हों, उसके विषय में ऐसी भाषा बोलकर जनता को भड़काना क्या उचित है? विशेषतः इन कथित छात्राओं को देखकर बताएँ आप। 

ये भी कहता हूँ कि, हैं तो ये हमारी देशज संतान ही, किंतु हमारे बच्चों को किसने इतना भड़काया और बहकाया है? कौन है जो हमारी इस मासूम छात्रशक्ति की लज्जा-लिहाज पर डाका डाल गया है? इनके सारे संस्कार अपहृत हो गए और हमें पता भी न चला। जॉर्ज सोरोस की सोच से बढ़ा ये आंदोलन है या अश्लीलता और देश विभाजन के दुष्कृत्य का नंगा नाच है?   

                  

नरेंद्र मोदी जी का ये सरेंडर, आरएसएस और इसके प्रचारक मोदी के लिए कुछ भी चिंताजनक नहीं है। 

ये महाशय मोदी और ये संघ, अपना झोला उठाकर कहीं भी, कभी भी चल पड़ेंगे। सोचना तो हमें है कि हम और कोई और ऐसा प्रधानमंत्री और ऐसी संघशक्ति कहाँ से लायेंगे जो हमें बारह वर्षों तक तमाम दुर्लक्ष्यों जैसे अद्वितीय आर्थिक विकास, गगन-पाताल को भेदने वाला इन्फ़्रास्ट्रक्चर, मंगल मिशन, चंद्रमा मिशन, राममंदिर, अनुच्छेद 370, कश्मीर में शांति, असम-बंगाल के रास्ते बांग्लादेशी घुसपैठियों पर रोक, विदेशों में हमारा बड़ा सा बार्गेनिंग पॉवर, पाकिस्तान में भीतर तक घुसकर एयर स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर आदि को साधकर भी दंगामुक्त शासन दे पायेगी? संघ परिवार के अतिरिक्त कोई भी पार्टी इनमें से एक भी काम करती तो देश भर में दंगे होते। खून की नदियाँ बहती। ऐतिहासिक मार-काट होती। कदाचित् (शायद) गृहयुद्ध भी हो जाता। शाहीन बाग से लेकर ये जंतर-मंतर तक, ये सब भारत में गृहयुद्ध भड़काने की तैयारी ही तो है।  

याद है न? इन्हीं लोगो के शब्द हैं - “धारा 370 को छू कर देख लो, खून की नदियाँ बह जाएँगी” और ये पाकिस्तानी भाषा भी याद होगी आपको - “पंद्रह मिनिट के लिए देश की फौज और पुलिस को रोक लेना हम इस देश में तख़्ता पलट देंगे” और यह भी कि “मंदिर.. तारीख नहीं बताएँगे”। ये सब इस संघशक्ति ने किया भी और खून की नदियाँ तो छोड़िए साहब; इन्होंने देश में परिंदे को पर भी न मारने दिए हैं। 

संघशक्ति से मोदी ने स्वयं को परिश्रमपूर्वक सिद्ध किया है, इस देश की जनता के समक्ष। 75 की आयु में अट्ठारह घंटे काम कर रहा ये बिना भगवे का सन्यासी हमारी अंतर्राष्ट्रीय पूंजी है। इन्होंने इस देश से बाबर और औरंगजेब का नाम मिटाया है और अरब में जाकर मदिरों के शिलान्यास से लेकर प्राणप्रतिष्ठा तक के दसियों आयोजन करवा दिए हैं। अरेबियन मुस्लिम योग-ध्यान के पीछे पागल हुए हैं तो इसी भारत सरकार की कलाकारी से ही हुए हैं। 

ये आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के विरोध में या फूलफ़्रूफ नीट परीक्षाओं के लिए नहीं था। यदि होता तो परीक्षाओं पर विश्व का सर्वाधिक सटीक और प्रभावी कानून आने के बाद ये आंदोलनकारी शांति से अलग हो जाते। ये आंदोलन उस संघ शक्ति के विरोध में है जो इस देश को कॉमन सिविल कोड की देने की तैयारी में लगी है, जो हमें नागरिकता रजिस्टर जैसा बड़ा कवच (सिस्टम) देनें की तैयारी कर रही है, जो हमें कभी न कभी हमारा मुकुटमणि पाक आकूपाइड कश्मीर भी वापिस दिलवाने वाली है। 

हमें यह भी सोचना चाहिए कि आखिर इन  फॉरेन पॉवर सेंटर्स को नरेंद्र मोदी से क्या कष्ट है और क्यों है? 

एक “शक्तिशाली भारत” के विरोध में खड़े है ये सब, और हमें लगता है कि ये प्रधानमंत्री का विरोध है।  

फिर कहता हूँ, ये सब वीडियो देखना, इस जैसे सैकड़ों वीडियो इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ घूम रहें हैं उन्हें भी देखना। दिल्ली छात्र आंदोलन के एआई जनरेटेड फोटो वीडियो आदि भी देखना। जनता को भड़काने और भुजाएँ फड़क जाएँ ऐसे फेक/नकली वीडियो/फोटो किस लक्ष्य से बने हैं? कौन है जो ऐसी पिशाच बुद्धि से ये सब करा रहा है?   

इसे भी पढ़ें: धर्मेंद्र प्रधान की सिर्फ मंत्री पद की कुर्सी गयी, राजनीतिक कद बरकरार है

सनद रहे मोदी तो बहाना है,  इनका लक्ष्य समूचे देश को पटिए पर लाना है और देश में गृहयुद्ध फैलाना है। 

धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र कोई कीमत नहीं है। इसकी एक बड़ी कीमत हमने चुका दी है और संभवतः आगे इससे भी बड़ी कीमतें हमें चुकानी पड़ेगी। समूचे देश को सावधान हो जाने का समय आ गया है। 

धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के सही गलत का प्रश्न नहीं उठा रहा हूं। इस त्यागपत्र के समय, परिस्थिति, पृष्ठभूमि, निर्लज्ज प्रकार की हठधर्मिता पर प्रश्न है। 

देश के मान. प्रधानमंत्री ने यदि देश की अंदरूनी शान्ति के लिए या आगे किसी बड़े लक्ष्य को साधने के लिए ऐसी फॉरेन फंडेड, फॉरेन लेंग्वेज्ड, फॉरेन फीडेड, फॉरेन माइंडेड और निर्लज्ज शक्तियों के आगे हथियार डाल दिए हैं। रही छात्रशक्ति की बात तो संघ प्रमुख ने स्पष्ट परामर्श (स्वयंसेवक के लिए निर्देश) दिया है कि हमें बच्चों से संवाद बढ़ाना ही होगा। 

मोदी जी द्वारा कृषि क़ानून वापिस लेते समय मैंने एक आलेख में लिखा था जनमत के दबाव में देश के राजा द्वारा अपने निर्णय बदलना राजा के जीवंत, विवेक, मर्म व उत्तरदायित्व भाव का प्रमाण है। प्रधानमंत्री जी लोकभीरु (जनता से डरने वाले) हैं तो यह शुभ-लक्षण है। यह भी सही है कि धर्मेन्द्र प्रधान जी का त्यागपत्र कराना ही था तो UGC के समय ही करा लेना था। वह सही समय था। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का यह समय ठीक नहीं है। 

आद. प्रधानमंत्री जी ने धर्मेंद्र जी प्रधान त्यागपत्र लेकर किसी शेर की भांति एक कदम पीछे लिया है तो किसी दीर्घकालिक एजेंडे की रक्षा और पूर्ति के लिए ही किया होगा। निश्चित ही उन्होंने संघशक्ति की प्रेरणा से यह कदम राष्ट्रहित में ही उठाया होगा।

इस पोस्ट के वीडियो देखिये। इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ बिखरे सैकड़ो वीडियो देखिये, फिर सोचिये।

फिर अपने आसपास के छात्रों को अवश्य देखिए। अपने नगर के सैकड़ों छोटे-बड़े सभी कालेज के विद्यार्थियों का बारीकी से चुपचाप परीक्षण और अध्ययन कीजिए। इसके बाद सोचिये और बताइये कि इस वीडियो में जो हैं क्या वे विद्यार्थी हैं? और यदि हैं भी तो क्या इन विद्यार्थियों के दबाव में देश की सत्ता को आना चाहिए? मोदी जी हों या कोई किसी अन्य दल के कोई और प्रधानमंत्री हों, उसके विषय में ऐसी भाषा बोलकर जानता को भड़काना क्या उचित है? विशेषतः इन कथित छात्राओं को देखकर बताएँ आप। 

ये भी कहता हूँ कि, है तो ये हमारी देशज संतान ही, किंतु इन्हें किसने इतना भड़काया और बहकाया है? कौन है जो हमारी इस छात्रशक्ति की लज्जा-लिहाज पर डाका डाल गया है? जॉर्ज सोरोस की सोच से बढ़ा ये आंदोलन है या अश्लीलता का नंगा नाच है?

            

नरेंद्र मोदी जी का ये सरेंडर आरएसएस और इसके प्रचारक मोदी के लिए कुछ भी चिंताजनक नहीं है। ये महाशय मोदी और ये संघ, अपना झोला उठाकर कहीं भी, कभी भी चल पड़ेंगे। सोचना तो हमें है कि हम और कोई और ऐसा प्रधानमंत्री और ऐसी संघशक्ति कहाँ से लायेंगे जो हमें बारह वर्षों तक तमाम दुर्लक्ष्यों जैसे अद्वितीय आर्थिक विकास, गगन-पाताल को भेदने वाला इन्फ़्रास्ट्रक्चर, मंगल मिशन, चंद्रमा मिशन, राममंदिर, अनुच्छेद 370, कश्मीर में शांति, असम-बंगाल के रास्ते बांग्लादेशी घुसपैठियों पर रोक, विदेशों में हमारा बड़ा सा बार्गेनिंग पॉवर, पाकिस्तान में भीतर तक घुसकर एयर स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर आदि को साधकर भी दंगामुक्त शासन दे पायेगी? संघ परिवार के अतिरिक्त कोई भी पार्टी इनमें से एक भी काम करती तो देश भर में दंगे होते। खून की नदियाँ बहती। ऐतिहासिक मार-काट होती। कदाचित् (शायद) गृहयुद्ध भी हो जाता। #खयाल_आया कि शाहीन बाग से लेकर ये जंतर-मंतर तक, सब भारत में गृहयुद्ध भड़काने की तैयारी ही तो है।  

याद है न? इन्हीं लोगो के शब्द हैं - “धारा 370 को छू कर देख लो, खून की नदियाँ बह जाएँगी” और ये पाकिस्तानी भाषा भी याद होगी आपको - “पंद्रह मिनिट के लिए देश की फौज और पुलिस को रोक लेना हम इस देश में तख़्ता पलट देंगे” और यह भी कि “मंदिर.. तारीख नहीं बताएँगे”। ये सब इस संघशक्ति ने किया भी और खून की नदियाँ तो छोड़िए साहब; इन्होंने देश में परिंदे को पर भी न मारने दिए हैं। 

संघशक्ति से मोदी ने स्वयं को परिश्रमपूर्वक सिद्ध किया है, इस देश की जनता के समक्ष। 75 की आयु में अट्ठारह घंटे काम कर रहा ये बिना भगवे का सन्यासी हमारी अंतर्राष्ट्रीय पूंजी है। इसने इस देश से बाबर और औरंगजेब का नाम मिटाया है और अरब में जाकर मदिरों के शिलान्यास से लेकर प्राणप्रतिष्ठा तक के दसियों आयोजन करवा दिए हैं। अरेबियन मुस्लिम योग-ध्यान के पीछे पागल हुए हैं तो इसी भारत सरकार की कलाकारी से ही हुए हैं।  

ये आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के विरोध में या फूलफ़्रूफ नीट परीक्षाओं के लिए नहीं था। यदि होता तो नीट पर कानून आने के बाद ये शांति से अलग हो जाते। ये आंदोलन उस संघ शक्ति के विरोध में है जो इस देश को कॉमन सिविल कोड की देने की तैयारी में लगी है, जो हमें नागरिकता रजिस्टर जैसा बड़ा कवच (सिस्टम) देनें की तैयारी कर रही है, जो हमें कभी न कभी हमारा मुकुटमणि पाक आकूपाइड कश्मीर भी वापिस दिलवाने वाली है। 

हमें यह भी सोचना चाहिए कि आखिर इन  फॉरेन पॉवर सेंटर्स को नरेंद्र मोदी से क्या कष्ट है और क्यों है? 

एक “शक्तिशाली भारत” के विरोध में खड़े है ये सब और हमें लगता है कि ये नरेंद्र मोदी का विरोध है।  

फिर कहता हूँ, ये सब वीडियो देखना, इस जैसे सैकड़ों वीडियो इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ घूम रहें हैं उन्हें भी देखना। दिल्ली छात्र आंदोलन के एआई जनरेटेड फोटो वीडियो आदि भी देखना। जनता को भड़काने और भुजाएँ फड़क जाएँ ऐसे फेक/नकली वीडियो/फोटो किस लक्ष्य से बने हैं? कौन है जो ऐसी पिशाच बुद्धि से ये सब करा रहा है?   

#सनद_रहे मोदी तो बहाना है।  इनका लक्ष्य समूचे देश को पटिए पर लाना है।

- डॉ. प्रवीण दाताराम 

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