By नीरज कुमार दुबे | Oct 16, 2026
भारत में सरकार की आलोचना करना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जब राजनीतिक विरोध की आड़ में देश की सेना और पुलिस को भी सरकार के खिलाफ सामूहिक लामबंदी का संदेश दिया जाने लगे, तब सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इस राजनीति की मंजिल क्या है? यूट्यूबर ध्रुव राठी के सेना और पुलिस को एकजुट होकर आवाज उठाने संबंधी बयान ने इसी सवाल को और गंभीर बना दिया है। उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP विक्रम सिंह ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की मांग की है। साथ ही पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल समेत कई और लोगों ने भी ध्रुव राठी के बयान की आलोचना की है। देखा जाये तो अब सवाल केवल एक यूट्यूबर के बयान का नहीं, बल्कि देश की सबसे संवेदनशील संस्थाओं को राजनीतिक टकराव में खींचने की कोशिश का है।
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ध्रुव राठी का यह बयान सामने आते ही उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह ने बेहद सख्त प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने मांग की कि इंटरव्यू की सत्यता की जांच कराई जाए, कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ली जाए और यदि बयान की पुष्टि होती है, तो उचित कानूनी कार्रवाई की जाए। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत कार्रवाई की मांग भी की। देखा जाये तो विक्रम सिंह का संदेश स्पष्ट है कि लोकतंत्र के नाम पर सुरक्षा संस्थानों की अनुशासन व्यवस्था को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
वहीं भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने भी सेना को सरकार के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसाने से जुड़े आरोपों पर सवाल उठाए। वरिष्ठ अधिवक्ता जय अनंत देहादराय ने भी बयान को गंभीर बताते हुए कानूनी कार्रवाई की मांग की। साथ ही जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपी वैध ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के खिलाफ सेना और पुलिस को खड़े होने का आह्वान करना एक ऐसी सीमा का उल्लंघन है, जिसे किसी भी सूरत में पार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत सरकार से मेरी अपील है कि बहुत देर हो जाए, उससे पहले ही अब कार्रवाई कीजिए।
देखा जाये तो ध्रुव राठी को समझना होगा कि भारतीय सेना का अनुशासन और राजनीतिक तटस्थता देश की सुरक्षा की बुनियाद हैं। सरकार की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, मगर सेना को राजनीतिक संघर्ष में खींचने की अपील गंभीर सवाल खड़े करती है। लोकतंत्र में विरोध कीजिए, मगर संस्थाओं की मर्यादा मत तोड़िए। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संदेश है।