उत्तर कोरिया: दिखावटी चुनाव में तानाशाह की फिर बल्ले-बल्ले

By डॉ. रमेश ठाकुर | Mar 24, 2026

2 करोड़ 66 लाख आबादी वाले अघोषित गुलाम मुल्क उत्तर कोरिया में 15वें ‘सुप्रीम पीपल्स असेंबली’ के संपन्न दिखावटी चुनाव में भी किम जोंग उन ने एकतरफा जीत हासिल करके फिर से अपने तानाशाह होने का परिचय न सिर्फ अपने देशवासियों को, बल्कि समूचे संसार को दे दिया है। सभी 687 सीटों पर उनके समर्पित लोग जीते हैं। मौजूदा चुनाव में भी उनके सामने ना कोई विपक्ष था और न ही कोई विरोधी? चुनाव में उन्होंने उम्मीदवार के रूप में अपने चपरासी, नौकर, जीजा, बहनें और जी-हुजूरी करने पार्टी कार्यकर्ता-कर्मचारियों को टिकट देकर उतारा था। चुनाव में किम जोंग की दो छोटी बहनें किम यो-जोंग, चो सन-हुईन और जीजा किम नॉउ व योंग-वोन भी जीते हैं। गठित कैबिनेट में इन चारों को बड़ी जिम्मेदारी देंगे किम जोंग।

उत्तर कोरिया में चुनाव का मतलब केवल कोरियाई आवाम के अनुशासन को चेक करना और सरकारी डेटा को अपडेट करना मात्र होता है। वहां जनता अपनी पसंद का न उम्मीदवार चुन पाती है और न वोट कर सकती है। वोट न करना देशद्रोह माना जाता है। नार्थ कोरियाई लोग किम जोंन का आदेश किसी भी सूरत में नहीं टालते। अगर वो कहें कि आज सूरज पूरब से नहीं पश्चिम से उगेगा, तो देशवासियों को हाँ में ही जवाब देना होता है। जब वो हंसते हैं, तो सबको हंसना पड़ता है। घर से दो दिन किसी को नहीं निकलना है, तो कोई नहीं निकलता। लॉकडाउन जैसी स्थिति वहां हो जाती है। ऐसी अजीबोगरीब शर्तों को नार्थ कोरियाई आवाम को न चाहते हुए भी मानना पड़ता है। उत्तर कोरियाई का संसदीय चुनाव का इतिहास 1948 से रहा है। तब, वहां श्रमिक पार्टी, चोंडो ईस्ट चांगु पार्टी, कोरियाई लोकतांत्रिक पार्टी, श्रमिक जन पार्टी, पीपल्स रिपब्लिकन पार्टी व डेमोक्रेटिक इंडिपेंडेंट पार्टी की धूम होती थी। लेकिन अब सिर्फ और सिर्फ तानाशाह का ही चारों ओर बोलबाला है।

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वहां, पिछला संसदीय चुनाव 10 मार्च 2019 को हुआ था। परंपरा प्रत्येक 5 साल बाद चुनाव कराने की है, लेकिन हुए 7 साल बाद हैं। इस चुनाव में आदेश था कि सभी सरकार के पक्ष में वोट करें, देशवासियों ने उनके आदेशानुसार वोट डाले। वोटर टर्नआउट 99.99 प्रतिशत रहा, जिनमें उनके पक्ष में रिकॉर्ड 99.93 प्रतिशत वोटिंग हुई। पंजीकृत मतदाताओं में केवल 0.0037 प्रतिशत वोटरों ने चुनावी प्रक्रिया में किसी कारण हिस्सा नहीं लिया जिनमें ज्यादातर ऐसे लोग बताए जाते हैं जो चुनाव के वक्त या देश से बाहर थे या हारी बीमारी से पीड़ित थे। सरकारी मीडिया एजेंसी कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी के मुताबिक 516 लोगों ने वोट नहीं डाले, जिनकी खोज पड़ताल जारी है। खोजने पर उन्हें मौत की सजा सुनाई जाएगी। घरों की तलाशी जारी है, हाथ पर लगे निशान की जांच की जा रही है। कुल मिलाकर पूर्ववर्ती चुनावों की तरह इस बार भी तानाशाह शासक का बोलबाला पूरे संसदीय चुनाव के दौरान रहा।

  

गौरतलब है कि किम जोंग उन की ‘वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया’ लंबे समय से देश पर जबरिया काबिज है। भविष्य में उम्मीद भी नहीं दिखती, कि उन्हें या उनके पारिवारिक सदस्यों को कोई सत्ता से हटा भी पाएगा? क्योंकि उन्होंने व्यवस्था ही ऐसी बना रखी है। चुनाव में अगर कोई सरकारी कर्मचारी उनके पक्ष में वोट नहीं करता, उसे सेवा से बेदखल कर दिया जाता है। अगर पब्लिक ने वोट नहीं किया तो उस पर देशद्रोह का मुकदमा करके सरेआम कोड़ों से पीटा जाता है। नार्थ कोरिया में नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका या कोई ऐसे मुल्क जैसी व्यवस्था नहीं है कि विरोध में वहां के लोग ‘जेन-जी’ जैसा आंदोलन कर सके। ऐसा सपने में भी कोई नहीं सोच करता। सोचेगा तो उसे जिंदा गाड़ दिया जाता है। पिछले साल अगस्त-2025 का वाक्या है जब किम जोंन उन अपनी कैबिनेट की मीटिंग कर रहे थे, तभी बीच में एक कर्मचारी ने चाय पीने को लेकर उनसे पूछ लिया। सजा के तौर पर जोंन ने उनकी जुबान और दोनों हाथ कटवा दिए थे।

मौजूदा 2026 का आम चुनाव भी उत्तर कोरिया के अनूठे राजनीतिक ढांचे को दर्शाता है कि जहां हर निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक ही उम्मीदवार होता है, जो किम के नेतृत्व वाली सत्ता द्वारा पहले से ही चुन लिया जाता है। मतदान में उत्तर कोरिया के वोटर्स को सिर्फ हां या ना कहने का अधिकार मिलता है। चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा नहीं होता। नॉर्थ कोरिया वैश्विक पटल से तकरीबन कटा हुआ है। उसे न अर्थव्यवस्था से मतलब है और न ही किसी किस्म की तरक्की से? अपने मन की हुकुमत किम जोंन चलाते हैं। किम जोंन न किसी मुल्क का दौरा करते हैं और न उनके यहां कोई राष्ट्राध्यक्ष जाता है। एकाध मर्तबा कोई पहुंचा भी तो उसे सरेआम मारा-पीटा गया। कईयों को जान से भी हाथ धोना पड़ा? ग्लोबल स्तर पर बनीं तमाम कल्याणकारी समितियों का भी नॉर्थ कोरिया सदस्य नहीं है। उनके प्रतिनिधि भी कहीं प्रतिभाग नहीं करते।

  

नॉर्थ कोरिया के अलावा रूस में भी ऐसी ही चुनावी प्रक्रिया है। वहां भी सरकारी कर्मचारियों और आम जनता को अपने पक्ष में वोट करने का आदेश दिया जाता है। ब्लादीन पुतिन भी अपने जीते-जी सत्ता से नहीं हट सकते। इस दिशा में कुछ और भी राष्टृध्यक्ष चल पड़े हैं। तानाशाह शासक बेशक लोकतंत्र होने की दुहाई देते हों, लेकिन वो गुलाम बनाकर रखते हैं अपने आवाम को। नॉर्थ कोरियाई लोग कब तानाशाह से मुक्ति पाएंगे, ये सवाल भविष्य के गर्भ में सुरक्षित है। तारीख कौन सी मुकर्रर होगी, ये तो आने वाले समय ही बताएगा। नॉर्थ कोरियाई लोग ज्यादातर शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। विश्व में जनसंख्या के मामले में 56वें स्थान पर है। 2.66 लाख वाले इस मुल्क के लोगों को आजादी की सुबह कब होगी नसीब उसकी दुआ पूरा संसार करता है। 

- डॉ. रमेश ठाकुर

सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

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