Shaurya Path: America-China, Iran President Death, Israel-Hamas और Russia-Ukraine से जुड़े मुद्दों पर चर्चा

By अंकित सिंह | May 23, 2024

प्रभा साक्षी के खास कार्यक्रम शौर्यपथ में हमेशा की तरह ब्रिगेडियर डीएस त्रिपाठी सर मौजूद रहे। हमसे उन्होंने विश्व के वर्तमान हालात पर चर्चा की। इस दौरान हमने उनसे कुछ यूरोपीय देशों द्वारा फिलीस्तीन को मान्यता देने को लेकर भी सवाल पूछा। साथ ही साथ हमने ईरान के राष्ट्रपति के मौत को लेकर हो रहे विश्लेषण पर भी ब्रिगेडियर त्रिपाठी से सवाल पूछा और जानना चाहा कि जो अलग-अलग तरह के विश्लेषण हो रहे हैं, उसमें कितनी सच्चाई है। रूस-यूक्रेन युद्ध हमेशा की तरह इस बार भी चर्चा के विषय रहे। साथ ही साथ अमेरिका और चीन के बीच लगातार चल रहे ट्रेड वॉर पर भी हमने ब्रिगेडियर त्रिपाठी से सवाल पूछा और जानना चाहा कि भविष्य में इसको लेकर क्या कुछ हो सकता है?

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1 कुछ यूरोपीय देश नार्वे, आयरलैंड और स्पेन फिलिस्तीन राज्य को मान्यता देने के लिए तैयार हैं, इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में इसराइल और हमास के कुछ नेताओं के खिलाफ अरेस्ट वारंट की भी सिफारिश की है। इसको कैसे देखते हैं आप?

- ब्रिगेडियर त्रिपाठी ने कहा कि इसराइल लगातार हमलावर है। वह रुकने का नाम नहीं ले रहा है। जबकि उसे मनाने की कोशिश लगातार जारी है। उन्होंने कहा कि मानवीय त्रासदी भयंकर है। रिसोर्सेज की कमी है। लेकिन इन समस्याओं का हल नहीं निकल पा रहा। 140 देश संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन के पक्ष में प्रस्ताव लेकर आए थे। लेकिन अमेरिका ने इसका विरोध किया। टू नेशन की बात हर कोई कर रहा लेकिन इसको अमल में कैसे लाया जाए, इस पर फिलहाल एक राय बनती हुई दिखाई नहीं दे रही है। उन्होंने कहा इजरायल के रुख को देखते हुए ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा कि वह शांत होने वाला है। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन को मान्यता देने वाले देशों को इसराइल आतंकवादियों का समर्थक बता रहा है। अमेरिका भी फिलहाल फिलीस्तीन को मान्यता देने का विरोध कर रहा है। अरब देश फिलीस्तीन को मान्यता देना चाहते हैं लेकिन खुलकर फिलहाल कुछ बोलने की स्थिति में भी नहीं हैं। ब्रिगेडियर त्रिपाठी ने कहा कि एक तरफ गोली चल रही है, बम गिर रहे हैं और दूसरी तरफ फिलीस्तीन को रिकॉग्नाइज करने की बात हो रही है, यह दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते। फिलीस्तीन को रिकॉग्नाइज करने से पहले वहां शांति लाना जरूरी है, बंधकों को छुड़ाना जरूरी है। अगर फिलीस्तीन को इस वक्त मान्यता देने की कोशिश की गई तो कहीं ना कहीं हमास का वर्चस्व एक बार फिर से हो सकता है। 

2 ईरान के राष्ट्रपति को ले जा रहे हेलीकॉप्टर की दुर्घटना के बारे में कई तरह के विश्लेषण आ रहे हैं। इस दुर्घटना के क्या संभावित कारण हो सकते हैं और इसकी वजह से मध्य पूर्व में क्या बदलाव हो सकता है?

- ब्रिगेडियर त्रिपाठी ने कहा कि आज़रबाइजान के दौरे पर गए ईरान के राष्ट्रपति के मौत के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आज़रबाइजान और ईरान के रिश्ते हमेशा से सामान्य नहीं रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में दोनों के बीच जबरदस्त रिश्ते बने हैं। उन्होंने कहा कि ईरान के राष्ट्रपति के मौत की शुरुआती कारण मौसम को बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि उस समय तीन हेलीकॉप्टर साथ में थे। दो हेलीकॉप्टर सुरक्षित लैंड कर जाते हैं। लेकिन वही हेलीकॉप्टर क्रैश होता है जिसमें ईरान के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री बैठे होते हैं। त्रिपाठी ने हेलीकॉप्टर क्रैश के पीछे मौसम के रोल से इनकार नहीं किया। लेकिन एक पक्ष यह भी उन्होंने दिया कि हेलीकॉप्टर 1968 अमेरिकन मॉडल का था। अमेरिका ईरान पर कई तरह के बैन लगाए हुए हैं जिस वजह से हो सकता है इन हेलीकॉप्टरों की मरम्मत नहीं हो रही होगी जिसकी वजह से हेलीकॉप्टर क्रैश किया होगा। ब्रिगेडियर त्रिपाठी ने कहा कि एक रीजन यह भी कहा जा रहा है कि इस घटना में कोई तीसरा पक्ष भी शामिल है। अमेरिका और इजराइल से ईरान की दुश्मनी जग जाहिर है। दावा किया जा रहा है कि लेजर बीम से ईरान राष्ट्रपति के हेलीकॉप्टर को निशाना बनाया जा सकता है जैसा कि इसराइल ने ईरान मिसाइल को नष्ट करने के लिए किया था। इसीलिए इस शंका को भी बल मिल रहा है। उन्होंने कहा कि मोसाद और सीआईआई सक्रिय हैं। इसके अलावा त्रिपाठी ने इस बात की भी आशंका जताई कि चुकी राष्ट्रपति अपने देश में भी लोकप्रिय नहीं थे। उनके खिलाफ देश में भी कई लोग खड़े थे। ऐसे में कोई इंटरनल साजिश भी हो सकती है। फिलहाल जांच के बाद ही चीजें सामने आएंगी। लेकिन जिस तरीके की चर्चाएं चल रही हैं, सभी पर गौर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ईरान के राष्ट्रपति के मौत के बाद पश्चिम एशिया की राजनीतिक स्थिति बदलेगी। साथ ही साथ पश्चिम एशिया को ईरान जो लीड करने की तैयारी में था, उस पर भी ब्रेक लगेगा। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि ईरान के राष्ट्रपति की मौत के बाद बहुत ज्यादा वैश्विक स्तर पर फर्क पड़ने वाला है। 

3 रूस यूक्रेन में विनाशकारी हमले किए जा रहा है। जेलेंस्की ने यूरोपीय देशों से आग्रह किया है कि वह पैट्रियट मिसाइल का इस्तेमाल अपने ही इलाकों से करें ताकि रूस की मिसाइलों को नष्ट किया जा सके। साथ ही रूस ने टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों का भी प्रशिक्षण जारी रखा है। इसको कैसे देखते हैं आप?

- रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर ब्रिगेडियर त्रिपाठी ने कहा कि व्लादिमीर पुतिन फिलहाल रुकने वाले नहीं है। पुतिन यह मानकर चल रहे हैं कि उनकी लड़ाई यूक्रेन से नहीं बल्कि पश्चिमी देशों से है। यही कारण है कि रूस की नीति में स्पष्टता साफ तौर पर देखने को मिल रही है। हालांकि, हाल में ही पुतिन ने कहा कि वह खारकीव पर कब्जा करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। लेकिन रूस सेना लगातार आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। ब्रिगेडियर त्रिपाठी ने कहा कि यूक्रेन की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। इसलिए वह पश्चिमी देशों से मदद की उम्मीद कर रहा है। यूक्रेन के कमांडर बोल रहे हैं कि हमारे पास कुछ नहीं है। दूसरी ओर रूस यूक्रेन की कमजोर कड़ी को तलाशने की कोशिश कर रहा है। यूक्रेन को पहले जैसी मदद नहीं मिल रही है। जबकि रूस पूरी प्लानिंग के साथ आगे बढ़ रहा है। रूस तो पश्चिमी देशों को अब न्यूक्लियर वार की भी धमकी दे रहा है। यह कई देशों के लिए टेंशन बढ़ने वाला है। 

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4 मध्य पूर्व व रूस यूक्रेन के बीच की लड़ाई के साथ ही अब अमेरिका और चीन के बीच में ऐसा लग रहा है कि व्यापार युद्ध शुरू हो जाएगा। जबकि अमेरिका के विदेश सचिव व व्यापार सचिव दोनों ने चीन का दौरा किया था लेकिन कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है। इसका क्या असर हो सकता है?

- ब्रिगेडियर त्रिपाठी ने कहा कि हम इसे वार नहीं बल्कि कनफ्लिक्ट कह सकते हैं। चीन और अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपने आप को व्यापार के केंद्र में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका ने कहीं ना कहीं खुद को व्यापारिक दृष्टिकोण से बहुत पहले मजबूत किया था। अब चीन इस ओर बढ़ रहा है, जिस वजह से दोनों देशों के बीच तनाव दिखाई दे रहा है। दोनों देश ट्रेड के मामले में बहुत पहले से आमने-सामने है। जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति थे तब तो विवाद ज्यादा बढ़ गया था। हालांकि जो बिडेन ने इसे कम करने की कोशिश की। लेकिन बात बनती हुई दिखाई नहीं दे रही है। इस कनफ्लिक्ट की वजह से दोनों देशों को नुकसान हुआ है। दोनों देशों में महंगाई बढ़ी है। चीन लगातार सस्ते दामों पर अपनी चीजों को बेच रहा है। अमेरिकन कंपनी को अपने यहां स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, जो कि अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि चीन और अमेरिका में डिसएग्रीमेंट बहुत चीजों को लेकर है लेकिन रास्ते बंद नहीं हुए हैं। बातचीत से सुलझाया जा सकता है। चीन अपने सस्ते सामानों की वजह से लोगों को डिपेंडेंट बना दिया है जो कि अमेरिका को चिंतित कर रहा है। 

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