'मुस्लिम-यादव' समीकरण छोड़ तेजस्वी की हर वर्ग को साधने की रणनीति

By अभिनय आकाश | Oct 05, 2020

बिहार लोकतांत्रिक राजनीति की किताबी समझ को चुनौती देता रहा है। सारे कायदे-कानूनों से अलग बिहार और लालू प्रसाद यादव की पार्टी, पहले जनता दल और फिर उसी में से निकले राष्ट्रीय जनता दल जिसने लगभग डेढ़ दशक से ज्यादा समय से बिहार पर राज किया। लेकिन इस बार का विधानसभा चुनाव राजद और पूरे अभियान की कमान संभाल रहे उनके छोटे पुत्र तेजस्वी यादव के लिए भी एक बड़ी परीक्षा है। जो बिहार के राजनीतिक इतिहास को जानते-समझते हैं, वे यह मानते हैं कि तमाम प्रतिकुलताओं के बावजूद लालू प्रसाद को कमतर आंकना उनके प्रतिद्वंद्वियों के लिए भयंकर भूल सरीखा रहा है। लेकिन लालू की छाया से इतर इस बार राजद अपनी जमीन तैयार करने की कवायद में लगा है। 

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सर्व समावेशी दल और गठबंधन के रूप में कर रहे प्रोजेक्ट

तेजस्वी यादव की राजद इस चुनाव में खुद को सर्व समावेशी दल और गठबंधन के रूप में आगे कर ही बढ़ रही है। इसकी कवायद उन्होंने कुछ महीने पहले ही शुरू कर दी थी। फरवरी के महीने में तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर विरोधियों पर आरोप लगाया था कि साजिश के तहत उनकी पार्टी को 'एमवाई' समीकरण वाली पार्टी की तरत प्रचारित किया जा रहा है। आरजेडी के बारे में गलत प्रचार किया जाता है कि ये अगड़ी जाति की विरोधी है। ये प्रचार पूरी तरह से गलत और भ्रामक है. हम प्रगतिशील समाज का पूरा आदर करते हैं और उनके हक की लड़ाई लड़ते हैं। जिसके बाद संगठन में मुस्लिम,यादवों से इतर अगड़े और अति पिछड़ी जातियों को जगह देने की कवायद शुरू की है। कांग्रेस को 70 सीटें देने के पीछे भी अगड़ी जातियों में सेंध लगाने की रणनीति का ही हिस्सा है। 

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