By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Feb 07, 2018
एक अंग्रेजी अखबार ने देश में चल रही पीएच.डी. (डॉक्टरेट) की उपाधियों की हेरा-फेरी पर एक खोजपूर्ण खबर छापी है। देश के लगभग सभी विश्वविद्यालय ऐसे लोगों को भी मानद पीएच.डी. की डिग्री दे देते हैं, जिनके मैट्रिक पास होने का भी पता नहीं हैं। पिछले 20 साल में 160 विश्वविद्यालयों ने 2000 से ज्यादा लोगों को मानद डॉक्टरेट की उपाधियां बाटी हैं। ऐसी मानद डिग्री पाने वालों में देश के राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और कई मंत्री तो हैं ही, सरकारी अफसर, कई अनपढ़ पूंजीपति और कई तथाकथित समाजसेवी भी हैं। इस मामले में मेरा कहना यह है कि ये सब लोग किसी न किसी कारण सम्मान पाने के हकदार हो सकते हैं लेकिन इन्हें डॉक्टरेट (पीएच.डी.) की डिग्री ही क्यों दी जाए।
कुछ ऐसे भी लोगों को डॉक्टरेट दे दी जाती है, जिनसे उन विश्वविद्यालयों को आर्थिक लाभ हुआ हो या होने की संभावना हो। उन पर हुई तरह-तरह की कृपाओं को लौटाने का यह प्रमुख साधन बन गया है। इसके पीछे वे विश्वविद्यालय अपनी कमियों, धांधलियों और भ्रष्टाचार पर पर्दा डाल देते हैं। कुछ लोग पैसे के जोर पर ये मानद उपाधियां या फर्जी डिग्रियां भी हथिया लेते हैं। वे अपने नाम के पहले ‘डॉक्टर’ लगाना कभी नहीं भूलते। उनके सारे नौकर-चाकर उन्हें ‘डॉक्टर साहब’ कहकर ही बुलाते हैं। मैं तो सर्वोच्च न्यायालय से कहता हूं कि ऐसी मानद और फर्जी उपाधियों पर वह कड़ा प्रतिबंध लगा दे ताकि हमारे विश्वविद्यालय बदनाम होने से बच सकें। इस तरह की उपाधियां और पद्मश्री और पद्मभूषण- जैसे सम्मान पाने वाले अपने निजी मित्रों को मैं प्रायः सहानुभूति का पत्र लिख देता हूं, क्योंकि इन कागजी उपाधियों के लिए उन्हें पता नहीं, किस-किस के आगे नाक रगड़नी पड़ती है।
-डॉ. वेदप्रताप वैदिक