महाकुंभ में सामाजिक समरसता की दिव्यानुभूति

By बृजनन्दन राजू | Mar 04, 2025

प्रयागराज में 45 दिनों तक चले सेवा समरसता व एकात्मता के महायज्ञ महाकुंभ 2025 की पूर्णाहुति हो चुकी है। त्यागी,तपस्वी,योगी, संत महंत, सन्यासी अपने-अपने स्थान को वापस लौट चुके हैं। देश ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने से आए 67 करोड़ से अधिक श्रद्धालु गंगा यमुना व सरस्वती की त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाकर अपने को धन्य कर चुके हैं। यहां पर धर्म व अध्यात्म के साथ—साथ सेवा समर्पण व समरसता की सरिता निरंतर प्रवाहित होती रही।


इस महायज्ञ के मुख्य यजमान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महाकुंभ को सफल बनाने के लिए जिन्होंने समर्पण के साथ परिश्रम की पराकाष्ठा की ऐसे सभी विभागों के अधिकारियों कर्मचारियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है। इस महाकुंभ में अगर सबसे ज्यादा प्रभावी भूमिका किसी की रही है तो वह स्वच्छता कर्मियों की रही है। महाकुंभ मे जो भी आया सबने स्वच्छता की सराहना की। महायज्ञ की सफलता के बाद मुख्यमंंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वच्छताकर्मियो के साथ बैठकर भोजन प्रसाद, ग्रहण कर सामाजिक समरसता की दिव्यानुभूति भी कराई।

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जिस तरह केवट ने त्रेत्रायुग में श्रीराम को गंगा पार कराया था उसी परम्परा को निभाते हुए नाविकों ने महाकुंभ में आये श्रद्धालुओं को संगम तक पहुंचाकर पवित्र स्नान कराया था। मुख्यमंत्री ने महाकुंभ में नाविकों के योगदान को लेकर उनके साथ संवाद ही नहीं किया अपितु उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया और नाव का पैसा देने की घोषणा कर उनका दिल जीतने का काम किया। मुख्यमंत्री ने महाकुंभ के महानायकों स्वच्छताकर्मियों, स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों व रोडवेज चालकों को 10 हजार रूपये अतिरिक्त बोनस की घोषणा की है। नाविकों के पंजीकरण के बाद नाव के लिए पैसा और पांच लाख रूपये तक का बीमा कवर भी मिलेगा। 

 

मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल के सहयोगों के साथ त्रिवेटी के तट पर झाड़ू लगाकर स्वच्छता अभियान का भी शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री योगी ने स्वयं गंगा जी के तट पर श्रद्धालुओं द्वारा छोड़े गये वस्त्रों को जलधारा से अलग किया।


वैसे कुंभ से बढ़कर सामाजिक समरसता का उदाहरण कोई हो नहीं सकता लेकिन एक योगी और गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर होते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सामाजिक समरसता की मिशाल पेश की है उससे लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए। हालांकि वह जिस परम्परा से हैं वहां हठ योग व त्याग की पराकाष्ठा रही है। नाथ परम्परा के योगी पहले स्वयं पर आधिपत्य व नियंत्रण करते हैं तब समाज को उस पर चलने के लिए कहते हैं। सामाजिक समरसता के क्षेत्र में गोरक्षपीठ की महती भूमिका रही है। योगी आदित्यनाथ के गुरू ब्रह्रमलीन महंत अवैद्यनाथ ने देशभर में सामाजिक समरसता की अलख जगाने का काम किया था।

 

संत आध्यात्मिकता के वाहक होते हैं। संत स्वयं के आचरण व व्यवहार से सामाजिक समरसता की सीख देते हैं। योगी आदित्यनाथ ने महाकुंभ के दौरान यह कर के दिखाया है। जातिभेद,विषमता औंर ऊंचनीच का का पालन करना अधर्म है। धर्मशास्त्र इसका समर्थन नहीं करता। समरसता के अभाव में ही भारत कमजोर हुआ।


महाकुंभ का आयोजन तो प्राचीन काल से हो रहा है। लेकिन यह पहला अवसर है जब भारत के सभी राज्यों से चाहे पूर्वोत्तर का क्षेत्र हो या दक्षिण भारत के राज्य सभी स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुण महाकुंभ में आए। इस बार भारत की माटी में जन्मे विविध पंथ और भारत की सनातन परंपरा से जुड़े सभी मत संप्रदायों के संतों व आचार्यों का आगमन ही नहीं बल्कि उनका समागम भी हुआ। वनवासियों के साथ हमको समरस होना चाहिए। इस बार महाकुंभ में वनवासी कल्याण आश्रम की ओर से वनवासी युवाओं का एक भव्य कार्यक्रम महाकुंभ में संपन्न हुआ। वनांचलों में रहकर साधना करने वाले और वनवासियों में धर्म परम्परा व संस्कारों को बचाकर रखने वाले ऐसे संतों का आगमन भी महाकुंभ में हुआ।


सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा समागम प्रयागराज महाकुंभ संपूर्ण विश्व के लिए आश्चर्य से कम नहीं रहा। भारत की विराटता का दिग्दर्शन महाकुम्भ में हुआ। सनातन की परम्पराओं के अनुसार योगी आदित्यनाथ ने अद्धितीय व्यवस्थाएं की। न भूतो न भविष्यति। सनातन की परम्परा के अनुसार महाकुंभ का आयोजन स्वत: होता है।  बिना बुलाये पूज्य संत और श्रद्धालु यहां पर संतों का सानिध्य व संगम में डुबकी लगाने के लिए आते हैं। इस बार भी करोड़ों लोग यहां समरस होकर आये। न जाति न पांति। सनातन के लिए इससे बढ़कर गर्वानुभूति क्या हो सकती है। पहली बार महाकुंभ में बौद्ध परंपरा के सभी शाखाओं के बौद्ध भिक्षु भंते व लामा आए। उनका स्वागत करने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं आए। शैव जैन सिख बुद्ध इन सभी परम्पराओं का जन्म इसी पुण्यभूमि में हुआ है। आपस में  अलग—अलग परम्पराओं के संतों के मिलने जुलने की प्रक्रिया संघर्ष के कालखण्ड में बंद हो गयी थी। इस परम्परा को इस बार फिर से शुरू की गयी। महाकुंभ में आयोजित संत समागम में देशभर के विभिन्न मत पंथ व सम्प्रदायों से जुड़े संतों ने दो दिनों तक सामाजिक समरसता विषय पर मंथन किया। विभिन्न मत पंथ व सम्प्रदायों के पूज्य संतों ने एक स्वर में न हिन्दू पतितो भवेत का उदघोष किया। संतों ने कहा कि सभी हिन्दू भाई हैं। हिन्दू कभी अछूत नहीं हो सकता। जातिभेद,विषमता,अस्पृश्यता इनका पालन करना अधर्म है। पूज्य संतों ने एकता,समता,समानता व समरसता का संदेश देने के साथ ही समाज से भेदभाव को समाप्त करने का संकल्प लिया। महाकुम्भ में दुनिया के कई देशों से आये भंते,लामा व बौद्ध भिक्षुओं ने संगम में आस्था की डुबकी लगाकर दुनिया को सनातन व बौद्ध की एकता का संदेश दिया। बुद्धं शरणं गच्छामि,धम्मं शरणं गच्छामि,संघम् शरणम गच्छामि के संदेश को जन—जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से शोभायात्रा निकाली गयी। शोभायात्रा के माध्यम से बौद्ध भिक्षुओं ने यह संदेश दिया कि बौद्ध व सनातनी एक थे,एक हैं और एक रहेंगे।


महाकुम्भ को बदनाम करने की भी चेष्टा की गयी लेकिन महाकुंभ की भव्यता दिव्यता अलौकितता व श्रद्धालुओं के उत्साह के आगे सब फीका पड़ गया। अमृत अनुष्ठान में सहभागी होने के लिए श्रद्धालुओं को कितना भी पैदल क्यों न चलना पड़ा हो लेकिन मां गंगा का स्पर्श पाते ही मिली चैतन्य व स्फूर्ति में सब भूल जाते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने संगम में डुबकी लगाने के बाद स्वच्छताकर्मियों को दान देकर सामाजिक समरसता का संदेश देने का काम किया। वहीं महाकुंभ में बना विहिप का सम्पूर्ण परिसर समरसता के रंग में सराबोर रहा। महर्षि वाल्मीकि,संत रविदास,पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर व गुरू गोविन्द सिंह के नाम से नगर बसाए गये थे। आश्रम के अंदर बने मार्गों के नाम भी सामाजिक समरसता के क्षेत्र में काम करने वाले संतों व महापुरूषों के नाम से रखे गये थे। रामानुजाचार्य की विशालकाय चल प्रतिमा सबका मन मोह रही थी। विहिप की ओर से स्वच्छताकर्मियों का सम्मान भी किया गया।


महाकुंभ में हजारों लोगों को नेत्र ज्योति प्रदान कर नेत्र कुंभ ने इतिहास रचने का काम किया है। नेत्रकुंभ में 400 चिकित्सकों ने अपनी सेवाएं दी। दो लाख 38 हजार मरीजों के आंखों की जांच की गयी। 01 लाख 63 हजार 403 लोगों को नि:शुल्क चश्मा वितरित किया गया।


हमारे यहां सेवा परमोधर्म: कहा गया है। महाकुंभ के दौरान 'लंगर भाई लालो जी' ने लाखों श्रद्धालुओं को भोजन प्रसाद से तृप्त किया।


इस लंगर में डेढ़ महीने तक देश के कई प्रान्तों के सिख बंधुओं ने श्रद्धालुओं की निरन्तर सेवाएं की। वहीं विश्व हिन्दू परिषद की ओर से सीता रसोई का संचालन किया गया जहां पर प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते थे। प्रयागराज के संगम क्षेत्र में भगवान ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ किया था। महाकुंभ के दौरान यहां पर अनेक स्थानों पर लक्षचण्डी यज्ञ,महाचण्डी यज्ञ संपन्न हुए लेकिन सेवा व समरसता का जो महायज्ञ संपन्न हुआ उसकी आभा से सम्पूर्ण हिन्दू समाज तेजस्वी ओजस्वी बनेगा।


इस्कान ने अडानी ग्रुप के सहयोग से महाकुंभ में 20 से अधिक स्थानों पर भंडारा चलाया जिसमें प्रतिदिन एक लाख से अधिक श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते थे। वहीं साधु संतों का शायद ही कोई शिविर रहा हो जहां श्रद्धालुओं के ठहरने व भोजन प्रसादी की व्यवस्था न रही हो। वहीं महाकुंभ में प्रयागराजवासियों व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवाभावी स्वयंसेवकों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। मेलाक्षेत्र में पूछताछ व खोया पाया विभाग में संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी सेवाएं दी। मेला में सामाजिक संस्थाओं द्वारा कई स्थानों पर भंडारा चलाया जा रहा था वहां पर प्रसाद वितरण में स्वयंसेवकों ने सहयोग किया। वहीं मौनी अमावस्या के दिन हुए हादसे के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने तत्परता दिखाते हुए पूरे शहर में यातायात व श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था कराई। बुजुर्गों को मेला क्षेत्र से बाहर पहुंचाने में स्वयंसेवकों की टोलियां लगी। प्रयाग में गंगा जमुना व सरस्वती मिल जाती है तो भेद दिखाई नहीं देता। यहां संगम के पूर्व अलग-अलग धारायें हैं। संगम का संदेश है कि यहां से आगे एक धारा चलेगी। इसलिए एक भारत श्रेष्ठ भारत के भाव को ह्रदयंगम करते हुए समरस समर्थ व स्वाभिमानी भारत बनाना है।


- बृजनन्दन राजू

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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