दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में स्थान, वैश्विक पहचान हुई और मजबूत

By Ankit Jaiswal | Dec 10, 2025

दीपावली केवल भारत तक सीमित त्योहार नहीं, बल्कि विश्व पटल पर अपनी सांस्कृतिक पहचान दर्ज करा चुकी परंपरा है। बुधवार को यूनेस्को ने दीपावली को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल कर दिया। मौजूद जानकारी के अनुसार यह निर्णय दिल्ली के लाल क़िले में आयोजित इंटरगवर्नमेंटल कमेटी की बैठक के दौरान लिया गया, जहाँ भारत इस सत्र की मेज़बानी कर रहा है। बता दें कि दीपावली हिंदू परंपरा का सबसे व्यापक और भावनात्मक त्योहार माना जाता है, जिसका उत्सव भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय समुदाय द्वारा भी मनाया जाता रहा है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि दीपावली भारतीय सभ्यता की आत्मा और हमारी सांस्कृतिक आस्थाओं का केंद्र रही है। उनका कहना था कि इस मान्यता से त्योहार की वैश्विक पहुँच और लोकप्रियता में और वृद्धि होगी। इसी क्रम में केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दीपावली केवल उत्सव नहीं बल्कि सदियों से जीवित परंपरा, भावनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक रही है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यह सम्मान महज़ उपलब्धि नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी भी है कि इस त्योहार की मूल भावना और परंपरा को संरक्षित रूप में अगली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए।

मौजूद जानकारी बताती है कि इस वर्ष यूनेस्को की 20वीं बैठक 8 से 13 दिसंबर तक आयोजित हो रही है और 2025 के सत्र की अध्यक्षता भारत के स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी. शर्मा द्वारा की जाएगी। दीपावली के साथ-साथ कई अन्य देशों की सांस्कृतिक परंपराएँ भी इस वैश्विक विरासत सूची में शामिल की गई हैं, जिनमें मिस्र का कोशरी, आइसलैंड का स्विमिंग पूल कल्चर, घाना का हाईलाइफ़ संगीत, जॉर्जिया की गेहूं संस्कृति और कांगो, इथियोपिया व साइप्रस की पारंपरिक लोक विधाएँ शामिल हैं। यह सूची इस बात का प्रमाण है कि विभिन्न समाजों की सांस्कृतिक परंपराएँ आज भी जीवन, स्मृति और लोकधारा की निरंतरता को जीवित रखे हुए हैं।

दीपावली के इस ऐतिहासिक सम्मान के साथ भारत ने न केवल सांस्कृतिक धरोहर की अंतरराष्ट्रीय मान्यता को मजबूत किया है, बल्कि विश्व समुदाय के सामने भी अपनी आध्यात्मिक और सभ्यतागत विरासत का प्रभाव पुनः स्थापित किया है, जो सहअस्तित्व, प्रकाश, सदाचार और मानविकता के सार्वभौमिक संदेश को आगे बढ़ाती रही है।

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