By संतोष उत्सुक | Mar 24, 2022
आती हुई गर्मियों में विशाल वृक्ष की छांव में बैठक कर बनाई गई नई एनजीओ के सदस्यों को बड़े अफसर से मिलने का समय, मुश्किल से मिलना था मुश्किल से ही मिला। अफसर भी क्या क्या करें किसी न किसी तरह का समारोह, आयोजन, उत्सव या फिर चुनाव चला ही रहता है। नागरिक व सामाजिक नहीं शुद्ध राजनीतिक योजनाओं को लागू करवाने के लिए खुद फील्ड में जाना पड़ता है। कमबख्त ग्रामीण क्षेत्र के दौरे ख़त्म ही नहीं होते। कई बार तो शरीर बहुत थक जाता है। कितनी बार तो नींद पूरी नहीं होती और छुट्टियों में भी दफ्तर बैठना पड़ता है। हर जगह वीडियो बनाकर अपलोड करने वाले तैयार खड़े होते हैं इसलिए सब कुछ बिलकुल सैट और फिट रखना पड़ता है। इधर मौसम खुलते ही हज़ारों एनजीओज़ के पुराने जंग लगते ढेर पर नई एनजीओ को उगा कर उसके अभिभावक मिलने पहुंच जाते हैं।
बड़े आदमी ने मन ही मन कहा कि इनसे किसी तरह पिंड छुड़ाना पड़ेगा। शहर की लगभग सभी योजनाओं में राजनीतिक दखलंदाज़ी अपनी मर्जी करवाती है। जो नगर राजा कहते हैं करते करवाते चलो, उन्हें क्या लेना, वर्तमान पोस्टिंग आराम से निकल जाए यही उनकी प्राथमिकता है। उनको लगा यदि हां कर दी तो ये सठियाए शरीर, पिचके गाल बार बार दुखी किया करेंगे। उन्होनें बड़े अदब से फरमाया, आप चिंता न करें, मैं किसी को भेज कर चैक करवाता हूं। पुराने नागरिकों में शहर के प्रति ज्यादा प्यार कूट कूट कर भरा हुआ था इसलिए उन्होंने फिर आग्रह किया कि हमारी गुज़ारिश है कि एक बार खुद आप वास्तविक स्थिति देखने हमारे साथ ज़रूर चलें। अपना काम नियमों के अनुसार निबटाने वाली कुर्सी बोली, आप इस उम्र में बड़े एनरजैटिक हैं, चिंता न करें, समय निकाल कर मैं हो आउंगा। इस बार उनका आशय था कि आप यही ऊर्जा घर में बैठ टीवी पर राजनीतिक हलचल देखने, अखबार पढने, पुराने फ़िल्मी गीत सुनने, फेसबुक या व्ह्ट्सएप युनिवर्सिटी में पढने या बाग में टहलने में लगाएं। वरिष्ठ नागरिकों को एक बार फिर से समझा दिया गया कि सरकारी काम अपनी चाल से होते हैं, उनकी चाल ढाल कोई बदल नहीं सकता हां खाल उचित समय पर बदल दी जाती है। इस बारे आम लोगों को बिल्कुल चिंता नहीं करनी चाहिए। हमारा असली रक्षक तो नीली छतरी वाला, बांसुरी वाला ही है।
- संतोष उत्सुक