By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 18, 2026
डीपी वर्ल्ड समूह के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) युवराज नारायण ने भारत के बंदरगाह विकास मॉडल पर नए सिरे से विचार करने की बात कही है। उन्होंने दलील दी कि समय-सीमा से बंधे पारंपरिक अनुबंध दीर्घकालिक निवेश को हतोत्साहित करते हैं, जबकि सरकारों और निजी परिचालकों के बीच संयुक्त उद्यम बुनियादी ढांचे के अधिक टिकाऊ विकास को गति दे सकते हैं। नारायण ने कहा, ‘‘30 साल के अनुबंध का क्या मतलब है?
सरकार एक भूस्वामी की भूमिका निभाए। आपके पास एक परिचालक हो, आप प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों पर सहमति बनाएं। जब तक भरोसा न टूटे, यह साझेदारी हमेशा बनी रहनी चाहिए।
इसमें क्या परेशानी है?’’ नारायण जिस मॉडल की वकालत कर रहे हैं, उसके तहत सरकार बंदरगाह के बुनियादी ढांचे का स्वामित्व अपने पास रखेगी और सहमत लक्ष्यों के आधार पर प्रदर्शन का मूल्यांकन करते हुए दीर्घकालिक संयुक्त उद्यमों के जरिये निजी परिचालकों के साथ साझेदारी करेगी। उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था बार-बार निविदा जारी करने और अनुबंध नवीनीकरण की अनिश्चितता के बिना निजी परिचालकों को क्षमता विस्तार और प्रौद्योगिकी में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब डीपी वर्ल्ड भारत में अपनी उपस्थिति का विस्तार करने की तैयारी कर रही है।
कंपनी ने अपने बंदरगाह, रेल और लॉजिस्टिक नेटवर्क को मजबूत करने के लिए देश में अतिरिक्त पांच अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। कंपनी पिछले तीन दशक में भारत में पहले ही करीब तीन अरब डॉलर का निवेश कर चुकी है। दुबई स्थित डीपी वर्ल्ड के भारतीय परिचालन में 60 लाख टीईयू (बीस फुट समकक्ष इकाई) की कुल वार्षिक क्षमता वाले पांच कंटेनर टर्मिनल, भंडार गृह, फ्रेट फॉरवर्डिंग, कंटेनर फ्रेट स्टेशन, मुक्त व्यापार भंडारण क्षेत्र और अंतर्देशीय रेल टर्मिनल शामिल हैं।
कंपनी अपने एकीकृत लॉजिस्टिक नेटवर्क का भी विस्तार कर रही है, जिसमें महाराष्ट्र में करीब 500 करोड़ रुपये के निवेश से समर्थित न्हावा शेवा बिजनेस पार्क का दूसरा चरण शामिल है। इसके अलावा कंपनी वधावन सहित बंदरगाह के बुनियादी ढांचे में आगे के अवसरों की तलाश कर रही है। नारायण ने कहा कि नए अवसर सामने आने पर कंपनी तीन से पांच अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश करने के लिए तैयार है, लेकिन उन्होंने परियोजनाओं के तेजी से क्रियान्वयन और निजी भागीदारी के लिए अधिक अनुकूल नीतिगत ढांचे की मांग की।
उन्होंने कहा कि भारत को आगे विस्तार करने से पहले मौजूदा बंदरगाह क्षमता और उसके उपयोग का अधिक स्पष्ट आकलन करने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि डीपी वर्ल्ड के अपने बंदरगाह पूरी क्षमता पर काम कर रहे हैं, जबकि व्यापक भारतीय बंदरगाह उद्योग के कुछ हिस्सों में स्थिति ऐसी नहीं है।