कोला वोला पी लो यार (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 03, 2023

उस दिन हम ‘सूफियों’ का सूखा जन्मदिन था। परिवार सहित, रात का खाना खाने के लिए रेस्तरां ढूंढ रहे थे। शनिवार की अस्त व्यस्त और मस्त शाम रही। असली भीड़ थी। नए नए नाम वाले चमकीले रेस्तरां,  खाने की जगहें दिख रही थी। नई सजावट, तेज़ लाइटें, मेकअप की चहक, दहक और महक में युवा ज्यादा थे। एक ख़ास मित्र ने फोन पर बधाई देते कहा, बहुत बहुत बधाई, जन्मदिन कहां सेलिब्रेट कर रहे हो।  हमने कहा डिनर के लिए निकले हैं, उन्होंने सुझाव दिया, यार कोला वोला ही खोल लेना। हम उनका मतलब समझ गए थे, आप भी समझ गए होंगे।  

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उन्हें हमेशा अफ़सोस रहता है कि फलाना बंदा खाता पीता नहीं। इनका सेलिब्रेशन तो फीका रह जाता होगा। इनका तो जीना बेकार है। संतरे का खालिस रस पिएंगे और पिलाएंगे तब भी नहीं लगेगा कि सेलिब्रेट कर रहे हैं। हमारे यहां तो संतरे का रस भी शुद्ध नहीं मिलता। किसी युग में असली कम्पनी ने जूस बेचना शुरू किया था जिसमें चीनी नहीं होती थी। पीने वालों को कुदरती चीज़ पसंद नहीं आई इसलिए बाज़ार में नहीं टिकी। कम्पनी का मुनाफ़ा बह निकला इसलिए फिर से चीनी और नकलीपन घोलकर पिलाना शुरू कर दिया। पार्टी करने वालों को भी संतुष्टि होने लगी कि चलो यार, जो बंदे विह्स्की या वाइन के लायक नहीं, उनके सेलिब्रेशन के लिए यही सही।

कुछ ‘किस्मत हीन’ बंदे तो बीयर भी नहीं पी सकते। भारतीय धर्मपत्नियां यह ‘अधर्म’ नहीं होने देती। वह बात दीगर है कि पत्नियों ने कितने ही रंग और आकार के ग़म सजाने के लिए पीना और जीना शुरू कर दिया है। मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने से जनाना जुल्फें खराब होने लगी हैं। यहां यह विचार भी शोर मचाते हुए प्रवेश कर गया है कि ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा। इसलिए अलग पार्टियों में जाम, आम छलक रहे हैं। यह सामयिक और ‘सकारात्मक’ भी है कि ग़मों को थामने के लिए पारम्परिक, ऐतिहासिक, सामाजिक पेय हाज़िर है।  

जिन्होनें पूरी ज़िंदगी कढ़ी चावल, अंडे वाला केक अंडा रहित समझकर, खाकर और कोल्ड ड्रिंक पीकर बिता दी वे क्या ख़ाक ज़िंदगी जिए। मदिरा के दो चार पैग लगा लिया करते तो कुछ तो माहौल बनता और मज़ा भी आता। कितनी बातें दिल खोलकर बताते, खूब अंग्रेज़ी फेंकते, राज़ उगलते और शान बढाती गालियां भी देते। ज़िंदगी के बखेड़ों की परवाह न करना भी सीख जाते। 

खैर, फिर एक ख़ास वार को उनका मंगल जन्मदिन रहा। हमने फोन कर पूछा, पार्टी शुरू हो गई, तो बोले, यार आज खाली खाली रहेगा आज खा पी नहीं सकते। हमने कहा, खाना पीना तो अच्छा है, तो वार का क्या। जन्मदिन है, आपके ईष्ट प्रसन्न होंगे कि बढ़िया खाया बढिया पिया । 

ज़िंदगी और बाज़ार का सामयिक, व्यवहारिक रूप से ज़रूरी हिस्सा है, खाना पीना। वह बात अलग है कि महिलाओं का साथ फ़ख्र महसूस कराता है, पुत्र पिए तो दुःख जैसा होता है, बेटी पिए तो परेशानी बढ़ने लगती है।  

ऐसे में कोला वोला नियमित खोल कर उत्सव मनता रहे तो हर्ज़ क्या है।

- संतोष उत्सुक 

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