आईआईएमसी महानिदेशक प्रो संजय द्विवेदी बोले, एक भारत श्रेष्ठ भारत है हमारा विकास मंत्र

By प्रेस विज्ञप्ति | Aug 10, 2022

नयी दिल्ली। इतिहास में अगर हमसे गलतियां हुईं हैं तो उन गलतियों को सुधारने की जिम्‍मेदारी भी हमारी ही है। 1947 में देश बंट गया, परन्तु अब मुल्‍क नहीं बंट सकता। अब सिर्फ हिंदुस्‍तान रहेगा और हिंदुस्‍तान पूरी दुनिया का मार्गदर्शन करेगा कि कैसे सभी लोग चाहे वे किसी भी धर्म, संप्रदाय के हों, हिंदुस्‍तान की सरजमीं पर अमन-चैन से रह सकते हैं। यह हिंदुस्‍तान की जमीन की खूबी है। आज हमारी एक ही पहचान है कि हम भारतीय हैं। हम सभी मिलकर भारत को श्रेष्ठ बनाएँगे। यह विचार आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी ने आज भारतीय जन संचार संस्थान एवं इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय कला केंद्र द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के अवसर पर व्‍यक्‍त किए।

वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों में मुख्यत: विभाजन की पीड़ा को ही व्यक्त किया जाता है, परन्तु आईआईएमसी के इस आयोजन में आज एक गंभीर अकादमिक विमर्श दिखाई दे रहा है, जो एक अनुकरणीय पहल है। उन्‍होंने बताया कि विभाजन की विभीषिका का एक पहलू यह भी है कि विश्व की इस भयानक त्रासदी की पीड़ा झेलकर भी भारत आने वाले शरणार्थियों ने अपने अंदर मौजूद मानवता की भावना को कम नहीं होने दिया। उनके द्वारा बड़े संख्या में खोले गए स्‍कूल, आश्रम और अस्‍पताल इसके उदाहरण हैं।

वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘सन्डे मेल’ के पूर्व संपादक त्रिलोक दीप ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे रावलपिंडी में रहते थे और जब पाकिस्‍तान बना वे 12 साल के थे। उन्‍होंने बताया कि 1947 में होली के आसपास उन्‍होंने कुछ धार्मिक नारे सुने, जिसके बाद पुलिस ने उन्‍हें अपने घरों में बंद हो जाने को कहा। बाद में बड़ी संख्या में लोगों को दो हफ्ते तक कैंपों में रखा गया। उन्‍होंने बताया कि इस घटना से उन्‍हें विभाजन का पूर्वाभास हो गया था। वे यह बताते हुए भावुक हो गए कि पत्रकार होने के नाते कैसे वे आजादी के बाद रावलपिंडी गए और अपने घर और स्‍कूल भी गए। उन्‍होंने बताया कि उन्‍हें उस मुल्‍क की बहुत याद आती है उस जमीन की बहुत याद आती है।

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वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला ने कहा कि वे एक ऐसे परिवार से आते हैं, जिसने विभाजन का दंश बहुत करीब से देखा और झेला है। उन्‍होंने कहा कि लोगों को लगता है कि पाकिस्‍तान से सिर्फ हिंदू ही भारत आए, लेकिन ऐसा नहीं है। कांग्रेस विचारधारा पर यकीन रखने वाले कई मुस्लिम भी पाकिस्‍तान से भारत आए। उन्‍होंने बताया कि जो शरणार्थी भारत आए उनका भारत की अर्थव्‍यवस्‍था में आज बहुत बड़ा योगदान है। शरणार्थियों में ज्‍यादातर व्‍यवसाय करने वाले लोग थे। वरिष्ठ लेखक कृष्णानंद सागर ने कहा कि विभाजन एक बहुत बड़ी त्रासदी थी, जिसकी जमीनी वास्‍तविकता सरकारी आंकड़ों से बहुत अलग है। उन्‍होंने बताया कि वे ऐसी सैंकड़ों दुर्घटनाओं के प्रत्‍यक्षदर्शी हैं, जहां ट्रेनों में लोगों को काटा गया, गोलीकांड हुए, लोगों को कैंपों में रखा गया और उन्‍हें वहां कई प्रकार की यातनाएं झेलनी पड़ीं।

उन्होंने अपनी पुस्तक ‘विभाजनकालीन भारत के साक्षी’ का जिक्र करते हुए बताया कि पुस्तक में विभाजन की त्रासदी के साक्षी रहे 350 लोगों के साक्षात्‍कार हैं और पुस्तक चार खंडों में प्रकाशित हुई है। कार्यक्रम की शुरुआत में फिल्म्स डिवीज़न द्वारा देश के विभाजन पर निर्मित एक लघु फिल्म दिखाई गई। कार्यक्रम का संचालन उर्दू पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन डीन अकादमिक प्रो. गोविंद सिंह ने दिया। संगोष्ठी में भारतीय जन संचार संस्‍थान के अध्‍यापक एवं कर्मचारी बड़ी संख्‍या में उपस्थित रहे।

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