भावना, सदभावना, दुर्भावना (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Feb 21, 2024

भौतिक युग में सम्प्रेषण इतना बढ़ गया है कि साथ साथ बैठे दो लोगों का बतियाना तो दूर दिल से मुस्कुरा एक दूसरे को देखने की फुर्सत नहीं है। उनकी भावनाएं शरीर में कैद हैं। अगर साथ बैठा व्यक्ति गिर जाए तो दूसरे का ध्यान बिलकुल भंग नहीं होगा। वह अपने मोबाइल पर महत्त्वपूर्ण सामग्री देखता रहेगा। यदि गिरा हुआ व्यक्ति उठ न पा रहा हो, परेशान हो रहा हो और चीखना शुरू कर दे तो साथ वाला पहले उसका वीडियो बनाएगा। वीडियो को अविलम्ब अपलोड करेगा। उससे पूछेगा कि क्या हुआ, अपना ध्यान क्यूं नहीं रखते। अपने शरीर को ऐसे क्यूं गिराते हो कि दूसरों को परेशानी हो। यदि उसे अपना नुकसान न होता दिखा तभी आगे कुछ करने की सोचेगा। वह अपनी भावना के अनुसार ही काम करेगा क्यूंकि भावना ही सोच को विकसित करती है।  

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भावनाओं की नदी के बीच आहत नामक पत्थर आ जाएं तो मुश्किल हो जाती है। छोटी सी बात पर मामले कोर्ट में चले जाते हैं। जब हम अपने दिल में उमड़ रही सुकोमल भावनाओं को दिमाग से खेलने दें तो परेशानी बढ़ जाती है। सुना है पिछले दिनों एक शेरनी का नाम एक पौराणिक देवी के नाम पर विचारित करने से भावनाएं आहत होने लगी जबकि हमारे पौराणिक चरित्रों में तो शक्ति का रूप देवी, शेर की सवारी करती दिखती हैं।

इधर कृत्रिम बुद्धि ने भावनाओं को तकनीक की खाद डालकर उगाना शुरू कर दिया है। लगता है इंसानी जज़्बा नए आकार और रंग के फूलों में खिला करेगा। तब क्या भावनाओं को भी किसी प्रयोगशाला में उगाया जाएगा और बाज़ार में उनकी बिक्री हुआ करेगी, जैसी भावना चाहिए खरीद लो। यह सच फिर साबित हो रहा है कि भावना को हैंडल करना आसान काम नहीं है।  

- संतोष उत्सुक

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