ज़िंदगी में ‘अ’ का प्रवेश

By संतोष उत्सुक | Dec 26, 2024

ज़िंदगी में हर जगह ‘अ’ प्रवेश कर चुका है। समाज असामाजिक हो रहा है, सामाजिक मिडिया असामाजिक मिडिया हो चुका है। राजनीति, सुराजनीति नहीं अराजनीति और कुराजनीति हुई जा रही है। जब सिर्फ पैसे के लिए बनाई जा रही फ़िल्में, अशालीन, अमर्यादित, असांस्कृतिक और स्वछन्द हो जाएं और असमझदार दर्शक ऐसी फिल्मों को हिट होने दें तो सामान्य जीवन, सामाजिक मंच और राजनीति में अनुशासन, शालीनता और मर्यादित आचरण ढूंढना मुर्खता है। ‘मैं झुकेगा नहीं’ को, एक बार नहीं दो बार दिल खोलकर स्वीकार किया जा चुका है तो लोकतंत्र कैसे अछूता रह सकता है। उसे भी तो अलोकतान्त्रिक होना ही है।  बदलते वक़्त के साथ लोकतंत्र, अलोकतंत्र होते होते भीड़तंत्र, मनमाना तंत्र, तनचाहा तंत्र होता जा रहा है। किसी क्षेत्र में शीर्ष क्या होता है। किस जगह या स्तर को उंचाई माना जाए। अब तो शीर्ष वही होता है जो जी भरकर कहीं भी चीख सके। अपने अपने समूह को सही साबित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो।


अब तो लोकतंत्र के असजग पहरेदारों की गुस्ताखियां देखते हुए यह जानकर सिर्फ हैरान हो सकते हैं कि हमारा लोकतंत्र दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना है। वह बात दीगर है कि लोक, उदास होकर तंत्र से, काफी पहले अलग हो चुका है। अब तो पुराने समय की चीर फाड़ करने की स्थायी जलवायु है। जंग लगे इस तंत्र में नए किस्म के तेल भरने ज़रूरी हैं। इसके पुर्जों को बदलना ज़रूरी है। सबसे सहज तरीका तो सीधे सीधे बात करने का है। यह रास्ता पूर्ण रूप से पारम्परिक है। हाथा पाई करने का रास्ता नया तो नहीं।

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मल्लयुद्ध तो हमारी पुरानी पारम्परिक, समृद्ध युद्ध कलाओं में से एक है।  वैसे तो मल्लयुद्ध अब कम हो रहा है लेकिन सर्दी के मौसम में शरीर को ठंडी परेशानी होती है। सब कुछ शिथिल होने लगता है। शायद तभी देश के माननीय कहे जाने वाले नायक भी अमाननीय हो रहे हैं और अपने विचारों को अपने शरीर के हिस्सों के माध्यम से दूसरों पर प्रकट कर रहे हैं। राजनीतिक आडम्बर को अपने सर पर बिठाकर नचा रहे हैं।  इस बहाने लोकतांत्रिक गरिमा अलोकतांत्रिक हो रही है। गरिमा अगरिमा होकर नई ऊंचाइयां हासिल कर रही है।

  

नैसर्गिक बुद्धि पर कृत्रिम बुद्धि का कब्ज़ा बढ़ता जा रहा है। क्षमा मांगने और माफी देने का रिवाज़ दफ़न हो चुका है। जो माफी मांग नहीं सकता वह माफ़ कैसे कर सकता है। ऐसे माहौल में काफी कुछ अलोकतांत्रिक दिखने और सुनने लगा है। यह अलोकतंत्र होते लोकतंत्र की नई प्रेरणाएं हैं। यहीं से नई पीढ़ी रुकेगा नहीं झुकेगा नहीं, की राह पकड़ चुकी है। पहले भी तो जो मामला शारीरिक युद्ध से निबटता था उसे संपन्न माना जाता था। क्या हम पुन प्राचीन असंस्कृति के आंगन में लौटना चाहते हैं।  


- संतोष उत्सुक

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