सच को आंच आए भी तो क्या (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jan 07, 2025

सच या झूठ की जांच न हो तो सब कुछ सुहावना, ठंडा रहता है। जांच शुरू हो जाए तो तो ठंडे पर्दों में आग लग जाती है। दुविधा यह है कि हर व्यक्ति सुविधा चाहता है लेकिन जांच की आंच नहीं चाहता। सब जानते और मानते हैं, जांच ईमानदारी और गहराई से की जाए तो बड़े से बड़ा पंगा, नंगा हो सकता है। उचित जांच का हुक्म होना ही ज़रा मुश्किल है। परिस्थितियों का मारा सच, राजनीति के सामने चीख चीख कर जांच की गुज़ारिश करता है लेकिन जिसके खिलाफ जांच होनी होती है वह भी राजनीतिक ज़बान में कहता है, राजनीति हो रही है। वह शांति का दान लगातार देता रहता है जिसका फायदा होता ही है। उसे बता दिया जाता है कि स्वादिष्ट आइसक्रीम कहां कहां लगानी है ताकि जांच की भट्टी में बेचारी इज्ज़त की कांच पिघलने से बच जाए। 

  

कहा भी गया है, सांच को आंच नहीं, लेकिन जांच के सांचे ऐसे हो गए हैं कि काले तीतर से लेकर इंसानी शरीर और लोकतंत्र के विशाल हाथी की ह्त्या करने वालों पर कोई खरोंच नहीं आ पाती। आज का मुहावरा, ‘सही जांच को नहीं कोई आंख’ हो गया लगता है। बुरे वक्त में जांच की टांग न फंसे तो माहौल शांत रहता है, जांच न होने से मान लिया कुछ पता नहीं चलता लेकिन यह भी तो अच्छा है न कि कुछ बुरा भी पता नहीं चलता। सामाजिक नायकों की ज़बान सुन्न हो जाती है, उनके दिमाग खाली इमारतों में तब्दील हो जाते हैं। संजीदा जांच ईमानदारी और सच की तरह परेशान करती है। वक़्त तो हमेशा चाहता है कि जांच होती रहे लेकिन यहां जांच करवाने वाले से ज्यादा परेशान जांच करने वाला हो उठता है क्यूंकि उसकी जांच को धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक आंखों से भेदा जाता है। उसे दोधारी नहीं कई धारी तलवार पर चलना पड़ता है, सुविधाओं को जख्मी होने से बचाते हुए अपनी जान की रक्षा भी करनी पड़ती है। 

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महंगे झूठ को कौन सा मुफ्त मिलने वाला सच हरा सका है। मेहनत से की गई जांच, तीखे कांच जैसी असलियत की अस्वादिष्ट फांके सबके सामने रख देना चाहती है लेकिन कई साल पेट भरते रहने के बाद यह जांच, हाथों से फिसल जाने वाला बहुत छोटा सा अंडा देती है। पानी बहुत इक्कठा करती है जांच, लेकिन बरसों बहुत मेहनत करने के बावजूद, हाथ में चुल्लू भर पानी नहीं भर पाती। सज़ा, दूर अच्छे वक़्त के सहारे खड़ी मुस्कुराती रहती है। सच, समंदर किनारे मनपसंद साज़ बजाता रहता है और कोई उसे नहीं देखता। उस साज़ पर बजने वाली धुन.... सच को आंच आए भी तो क्या..... जैसी होती होगी।


- संतोष उत्सुक

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