By संतोष उत्सुक | Oct 13, 2023
अपनी सुविधायुक्त रिहाइश में रात भर आराम से सोकर वह सुबह उठे। निजी स्वास्थ्य प्रबंधक द्वारा दिए पेय का रसपान कर बाग़ में टहले। प्रकृति संवाद करते हुए योग किया। नहाकर, ईष्ट पूजन कर ताज़ा उम्दा फलों का रस पिया। बैठक में आकर आज का पहला वक्तव्य दिया, ‘दुर्भाग्यवश समाज में विनम्र भाव में कमी आई है।’ एक तरह से उन्होंने कह दिया कि बाज़ार में दुर्भाग्य का भाव चढ़ता जा रहा है। वह बात दीगर है कि उनको नहीं लगता कि उनका सौभाग्य तो दूसरों के दुर्भाग्य के कारण ही है। अब तो विनम्रता भी दुर्भाग्य का साथ दे रही है, अभिनय की तरह हो रही है। उसे सजा, संवारकर बाज़ार में उतार दिया गया है।
प्रकृति ने जो कुछ हमारे जीवन में रोपा वह दुर्भाग्यवश ही उजड़ा। इसमें कुदरत प्रेमी इंसान की ज़रा भी गलती नहीं है। संसार नश्वर है, जो सृजन हुआ है उसका विसर्जन होना है। अगर विदेशी शैली में संजीदा खोज हो तो पता चलेगा कि यह सब दुनिया रचने वाले की गलती है। अब तो यह उनका दुर्भाग्य ही है कि उनकी सबसे आश्चर्यजनक रचना बदहाल हुई जाती है। संसार के महाशक्तिशाली व्यक्ति एक दूसरे को खत्म करने पर तुले हैं। यह सब मानवता के दुर्भाग्य के कारण हो रहा है।
दुर्भाग्य के कारण ही अब राजनीतिज्ञ खुद हर मामले में राजनीति करते हुए दूसरों से कहते हैं कि राजनीति न करें। राजनेता कहता है कि संकट की घड़ी में राजनीति न करें। यह उनका सौभाग्य है लेकिन उनका चुनाव जीतना जनता का दुर्भाग्यशाली होना बताता है। कुदरत की नाराजगी या अप्रत्याशित कारणों से तबाही और जान माल का नुकसान होता है तो उसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाता है। बात तो ठीक है उनकी, राजनीतिजी तो सौभाग्य के कारण ही विकासजी के नाम पर सड़कों, इमारतों, पुलों और सुरंगों के माध्यम से पर्यावरण का नुकसान करती है।
सबसे सुरक्षित कारण यह है कि घटनाएं दुर्भाग्यवश होती हैं। अवैध निर्माण, अवैध खनन, अनुचित विकास कार्यों का कोई दोषी नहीं। इससे पता चलता है कि हमारी ज़िंदगी में सौभाग्य कम सक्रिय है दुर्भाग्य ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर रहा है।
- संतोष उत्सुक