By ललित गर्ग | Aug 14, 2026
12 अगस्त 2026 का दिन भारतीय संसद के लिए इसलिए महत्वपूर्ण रहा कि विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 यानी एफसीआरए विधेयक को लोकसभा ने 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति- जेपीसी के पास भेज दिया। यह फैसला केवल एक विधेयक को संसदीय प्रक्रिया के अगले चरण में भेजना नहीं है, बल्कि उस व्यापक बहस का अवसर है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी धन की पारदर्शिता, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता, नागरिक समाज की भूमिका और लोकतांत्रिक अधिकार-सभी एक साथ जुड़े हुए हैं। विधेयक को जेपीसी के पास भेजे जाने से सरकार और विपक्ष के बीच तत्काल टकराव को कुछ हद तक विमर्श में बदलने का अवसर मिला है। एफसीआरए का इतिहास भी इस बहस की गंभीरता को समझने में मदद करता है। विदेशी धन के माध्यम से देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर बाहरी प्रभाव की आशंकाओं को देखते हुए 1976 में पहली बार कानून बनाया गया था। वर्ष 2010 में इसे नए एफसीआरए कानून से प्रतिस्थापित किया गया और उसके बाद 2020 सहित विभिन्न चरणों में इसके प्रावधान अधिक कठोर होते गए। आज यह कानून केवल विदेशी चंदे की प्राप्ति और उसके उपयोग का लेखा-जोखा रखने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े विमर्श का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
भारत में समय-समय पर ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें विदेशी वित्तपोषण के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितताओं अथवा राष्ट्रीय हित से टकराने वाली गतिविधियों को लेकर सवाल उठे हैं। इसलिए एफसीआरए का मूल उद्देश्य-विदेशी अंशदान को पारदर्शी, उत्तरदायी और वैध उद्देश्यों तक सीमित रखना-न तो अनुचित है और न ही लोकतंत्र विरोधी। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता और प्रशासनिक शक्ति के विस्तार के बीच एक स्पष्ट रेखा भी होनी चाहिए। यही इस विधेयक की असली परीक्षा है। यदि किसी संस्था ने विदेशी धन का इस्तेमाल आतंकवाद, हिंसा, अलगाववाद, जबरन या प्रलोभन आधारित धर्मांतरण, राजनीतिक अस्थिरता अथवा भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में किया है, तो उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। राष्ट्रहित में ऐसी कठोरता आवश्यक है। मगर दूसरी ओर यदि कोई संस्था अस्पताल चला रही है, गरीबों के लिए शिक्षा उपलब्ध करा रही है, पर्यावरण संरक्षण कर रही है, महिलाओं और बच्चों के लिए काम कर रही है अथवा प्राकृतिक आपदा में राहत पहुंचा रही है, तो केवल तकनीकी या प्रक्रियागत चूक के कारण उसके वर्षों के सामाजिक कार्य और विदेशी अंशदान से निर्मित परिसंपत्तियों पर तत्काल सरकारी नियंत्रण स्थापित हो जाना चिंता का विषय बन सकता है। यही कारण है कि जेपीसी के पास जाना इस विधेयक के लिए एक सकारात्मक अवसर है। संसद में बहुमत से कानून पारित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन जिन कानूनों का प्रभाव हजारों संस्थाओं, लाखों लाभार्थियों और देश के व्यापक नागरिक समाज पर पड़ता हो, उनकी बारीकी से जांच लोकतंत्र को मजबूत करती है। जेपीसी में विपक्ष अपनी आपत्तियां रख सकता है, सरकार अपने तर्क स्पष्ट कर सकती है और विधि विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, वित्तीय विशेषज्ञों तथा सुरक्षा एजेंसियों के अनुभवों को भी सामने लाया जा सकता है।
विधेयक में एक महत्वपूर्ण संतुलनकारी प्रावधान यह भी है कि धार्मिक स्थल की धार्मिक प्रकृति को बनाए रखना अनिवार्य होगा। नामित प्राधिकरण किसी ऐसे स्थल को दूसरे उद्देश्य में बदल या उसकी धार्मिक प्रकृति समाप्त नहीं कर सकेगा। इसके अलावा प्रभावित संस्था को 90 दिनों के भीतर पुनरीक्षण का अधिकार और जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील का प्रावधान दिया गया है। सरकार ने यह भी बताया है कि पंजीकरण बहाल होने पर अस्थायी रूप से निहित संपत्तियां और अप्रयुक्त धन वापस किए जाएंगे। ये प्रावधान स्वागत योग्य हैं, लेकिन सवाल यह रहेगा कि इन अधिकारों की वास्तविक स्वतंत्रता और प्रक्रिया कितनी प्रभावी होगी। एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन नवीनीकरण से जुड़ा है। 2026 के नियमों में पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये विदेशी अंशदान के उपयोग को सक्रिय संस्था की पहचान के रूप में रखा गया है। साथ ही गतिविधि और राज्य-विशिष्ट पंजीकरण तथा अधिक विस्तृत उपयोग संबंधी जानकारी देने की व्यवस्था भी की गई है। यह व्यवस्था निष्क्रिय संस्थाओं पर नियंत्रण के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन जेपीसी को यह भी देखना होगा कि क्या हर छोटी लेकिन वास्तविक सामाजिक संस्था के लिए 10 लाख रुपये खर्च करना व्यावहारिक मानदंड है। सामाजिक उपयोगिता का मूल्य केवल धनराशि से नहीं किया जा सकता।
एफसीआरए की बहस को केवल ‘सरकार बनाम विपक्ष’ या ‘राष्ट्रवाद बनाम नागरिक स्वतंत्रता’ के द्वंद्व में सीमित करना भी उचित नहीं होगा। असली प्रश्न इससे कहीं बड़ा है-भारत विदेशी धन को किस तरह स्वीकार करेगा और यह सुनिश्चित कैसे करेगा कि विदेशी संसाधन भारतीय समाज के हित में काम करें, न कि भारत की नीतियों और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने का माध्यम बनें? इसी के साथ यह भी तय करना होगा कि सरकार की नियामक शक्ति इतनी व्यापक न हो जाए कि स्वतंत्र सामाजिक संस्थाओं की वैध असहमति भी संदेह की दृष्टि से देखी जाने लगे। भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र में नागरिक समाज सरकार का विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का सहयोगी अंग है। हजारों गैर-सरकारी संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, महिला सशक्तीकरण, दिव्यांग कल्याण और आपदा राहत के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाली प्रत्येक संस्था को पारदर्शिता, लेखांकन और राष्ट्रीय कानूनों का पालन करना चाहिए, लेकिन सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि नियमन का उद्देश्य संस्थाओं को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि धन के सही उपयोग को सुनिश्चित करना हो। संसद और जेपीसी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही संतुलन स्थापित करने की है। विदेशी चंदे की आड़ में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, लेकिन सामाजिक सेवा की आड़ में यदि कहीं वित्तीय अनियमितता है तो उसके लिए भी कोई छूट नहीं होनी चाहिए। समान रूप से, वैध सामाजिक कार्य को केवल वैचारिक असहमति के कारण संदेह के घेरे में नहीं लाया जाना चाहिए। कानून ऐसा हो जिसमें अपराध पर कठोरता और वैध सामाजिक कार्य के प्रति संवेदनशीलता-दोनों साथ चलें।
एफसीआरए संशोधन विधेयक भारत की शासन-व्यवस्था के लिए एक बड़ा अवसर भी है। यदि जेपीसी इस बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर तथ्य, कानून, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के संतुलन के आधार पर देखती है, तो यह विधेयक केवल विदेशी चंदे को नियंत्रित करने वाला कानून नहीं रहेगा, बल्कि भारत में पारदर्शी, उत्तरदायी और स्वस्थ नागरिक समाज की नई आधारशिला बन सकता है। अब अपेक्षा यह है कि जेपीसी न तो सरकारी कठोरता को आंख मूंदकर स्वीकार करे और न विपक्ष की आशंकाओं को अंतिम सत्य माने, बल्कि तथ्यों की गहराई में जाकर ऐसा संतुलित कानून सुझाए जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा भी सुरक्षित रहे, विदेशी धन भी पारदर्शी रहे और सामाजिक सेवा की स्वतंत्रता भी अक्षुण्ण रहे। यही एफसीआरए की वास्तविक कसौटी है-विदेशी धन पर नियंत्रण हो, लेकिन जनसेवा पर अंकुश नहीं।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार