Savitribai Phule Birth Anniversary: महिलाओं को शिक्षित करने के लिए झेली तमाम मुश्किलें, सावित्रीबाई फुले ऐसे बनीं देश की पहली महिला शिक्षक

By अनन्या मिश्रा | Jan 03, 2024

आज ही के दिन यानी की 3 जनवरी को देश की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले का जन्‍म हुआ था। सावित्रीबाई फुले न सिर्फ एक शिक्षक बल्कि नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता, समाज सुधारक और कवियत्री भी थीं। आज के समय में भले ही हमारे देश की महिलाएं स्पेस तक में अपना परचम लहरा चुकी हों। लेकिन देश की आजादी से पहले महिलाओं को शिक्षा का अधिकार नहीं था। वहीं 18वीं सदी में तो महिलाओं का स्कूल जाना भी पाप माना जाता है। ऐसे समय में सावित्री बाई फूले ने न सिर्फ समाज में महिलाओं की शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ाई की। बल्कि एक स्कूल की स्थापना भी की थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सावित्रीबाई फुले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

महाराष्ट्र के सतारा जिले के नयागांव में एक दलित परिवार में 3 जनवरी 1831 को सावित्रीबाई फुले का जन्‍म हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और मां का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले जब शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल जाती थीं, तो लोग उनपर पत्थर फेंकते थे। लेकिन इसके बाद भी वह अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटकीं। उन्होंने शिक्षा के हक के लिए आवाज उठाई। इसलिए उनको मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है।

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विवाह

आपको बता दें कि साल 1849 में जब वह महज 9 साल की थीं, तो उनका विवाह समाजसेवी ज्योतिराव फुले के साथ हो गया। शादी के बाद वह अपने पति के साथ पुणे आ गईं। हांलाकि विवाह के समय सावित्रीबाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं। लेकिन उनके पढ़ने व सीखने की लगन को देखते हुए ज्योतिराव फुले ने उनको पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। वहीं उन्होंने शिक्षक बनने का प्रशिक्षण अहमदनगर और पुणे में लिया और एक योग्य शिक्षक बनीं। 

स्कूल की स्थापना

महिला व लड़कियों को शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए सावित्रीबाई फुले ने अपने 18वें जन्मदिन यानी की 3 जनवरी 1848 को पुणे में ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर एक स्कूल की स्थापना की। इस स्कूल में विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं को एडमिशन दिया गया। वहीं सावित्रीबाई फुले 1 साल में 5 नए स्कूल खोलने में सफल रहीं। उस दौरान तत्कालीन सरकार द्वारा उनको सम्मानित भी किया गया। उस समय महिलाओं व लड़कियों की शिक्षा पर सामाजिक पाबंदी होने के बाद भी सावित्रीबाई फुले द्वारा बालिक स्कूल चलाना काफी मुश्किलों भरा रहा। लेकिन उन सारी पाबंदियों को तोड़ते हुए वह खुद शिक्षक बनीं और अन्य महिलाओं के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया।

लोग मारते थे पत्थर

देश में आजादी से पहले लोग कई कुरीतियों से घिरे हुए थे। देश में सतीप्रथा, बाल-विवाह, छुआ-छूत और विधवा-विवाह जैसी कुरीतियां व्याप्त थी। ऐसे में सावित्रीबाई फुले का जीवन काफी मुश्किलों भरा रहा। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई थी। जिसके कारण उनको समाज के एक बड़े वर्ग का विरोध झेलना पड़ा था। स्कूल जाने के दोरान लोग उन पर पत्थर मारते और कूड़ा फेकते थे। लोगों के इस व्यवहार के बाद भी उन्होंने स्कूल जाना नहीं छोड़ा। वह अपने साथ झोले में एक साड़ी लेकर जाती थी। स्कूल पहुंचने के बाद गंदी साड़ी बदल लेती थी। 

महिलाओं के हक के लिए उठाई आवाज

सावित्रीबाई फुले देश में विधवा महिलाओं की स्थिति देख काफी दुखी रहती थीं। विधवा महिलाओं के लिए उन्होंने साल 1854 में एक आश्रय खोला। वहीं सालों-साल सुधार के बाद साल 1864 में इसको एक बड़े आश्रय में बदल दिया। इस आश्रय गृह में विधवा, बाल बहुओं और निराश्रित महिलाओं को जगह मिलने लगी। सावित्रीबाई फुले आश्रयगृह में रहने वाली सभी महिलाओं को शिक्षित करने के काम करती थीं।

इसके साथ ही उन्होंने एक विधवा के बेटे यशवंतराव को गोद लिया हुआ था। उस दौरान छुआछूत के कारण दलितों और नीच जाति के लोगों का आम गांवों में कुंए पर पानी लेने के लिए जाना वर्जित था। इसके विरोध के लिए उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर एक कुंआ खोदा। जिससे कि सभी लोग उस कुंए से पानी ले सकें। हांलाकि उनके इस कदम का भी समाज में काफी विरोध हुआ था।

मृत्यु

आपको बता दें कि साल 1890 में सावित्राबाई फुले के पति ज्योतिराव का निधन हो गया था। तब उन्होंने समाज के बनाए नियमों को तोड़ते हुए अपने पति का अंतिम संस्कार किया और चिता को अग्नि दी। फिर साल 1897 में पूरा महाराष्ट्र प्लेग बीमारी की चपेट में आ गया, तो सावित्रीबाई फुले लोगों की मदद के लिए निकल पड़ीं। इस दौरान वह खुद भी प्लेग का शिकार हो गईं। जिसके चलते 10 मार्च 1897 को सावित्राबाई फुले का निधन हो गया।

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