राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का प्रतीक है होली का त्योहार

By बाल मुकुन्द ओझा | Mar 11, 2017

भारत में त्योहार और पर्वों का अनादि काल से विशिष्ट महत्व है। हमारी संस्कृति की यह अनूठी विशेषता है कि हमारे त्योहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित कर लोगों में समता, समानता, सद्भाव, प्रेम और भाईचारे का सन्देश प्रवाहित करते हैं। होली देश का सबसे पुराना त्योहार है जिसे छोटे−बड़े अमीर−गरीब सभी लोग मिलजुल कर मनाते हैं। यह असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। राग−रंग का यह पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग रंग और नृत्य इसके प्रमुख अंग हैं। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग−बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़−पौधे, पशु−पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से आह्लादित हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का हृदय खुशी से नाच उठता है। बच्चे−बुजुर्ग सभी सब कुछ संकोच और रूढियाँ भूलकर ढोलक−झाँझ−मंजीरों की धुन के साथ नृत्य−संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। उत्साह और उमंग से भरा ये त्योहार एक दूसरे के प्रति प्रेम, स्नेह और निकटता लाता है। इसमें लोग आपस में मिलते हैं, गले लगते हैं और एक दूसरे को रंग और अबीर लगाते हैं। इस दौरान सभी मिलकर ढोलक, हारमोनियम तथा करताल की धुन पर धार्मिक और फागुन गीत गाते हैं।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, पंजाब, दिल्ली आदि हिन्दी भाषी प्रदेशों में होली का पर्व भारी उल्लास और रंगों के साथ मनाया जाता है। देश के अन्य राज्य भी अलग−अलग तरीकों से होली का आनन्द उठाते हैं। ब्रज, मथुरा और बरसाने की होली विश्व प्रसिद्ध है। देश में होली पर्व को अनेक कहानियों के साथ भी जोड़कर देखा जाता है। उत्तर भारत के राज्यों में जिसमें राजस्थान भी शामिल है, भक्त प्रहलाद की कहानी विख्यात है। प्रहलाद भक्त की इस प्राचीन कहानी में बताया गया है कि हिरण्यकश्यप नाम का एक क्रूर और शक्तिशाली शासक था। वह स्वयं को न केवल भगवान मानता था अपितु दूसरों को भी प्रेरित करता था कि उसे भगवान के रूप में माना जाकर उसकी पूजा−अर्चना की जाये। उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था और भगवान के भक्तों पर तरह−तरह के अत्याचार करता था। हिरण्यकश्यप का पुत्र था प्रहलाद। प्रहलाद प्रभु की भक्ति में लीन रहता था जो उसके पिता को कभी सहन नहीं होता था। पिता की लाख कोशिशों के बावजूद प्रहलाद प्रभु भक्ति से विचलित नहीं हुआ। इस पर हिरण्यकश्यप ने उसे दंडित करने का फैसला किया। हिरण्यकश्यप की बहिन होलिका को यह वरदान मिला था कि वह कभी आग में भस्म नहीं होगी। इसी का लाभ उठाते हुए हिरण्यकश्यप ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को गोदी में बैठाकर जलती आग पर बैठ जाये ताकि होलिका बच जाये और प्रहलाद जलकर भस्म हो जाये। मगर हुआ इसका उल्टा। होलिका भस्म हो गई और प्रहलाद बच गया। होलिका दहन को प्रतीक के रूप में आज भी समूचे देश में मनाया जाता है। होली का पर्व नजदीक आते ही एक सार्वजनिक स्थान पर होली का झंडा गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी हो जाती है। होली का पहला दिन होलिका दहन और दूसरा दिन धुलंडी के रूप में मनाया जाता है। धुलंडी के दिन एक−दूसरे पर रंग गुलाल डालकर पूरी मस्ती से गाते−बजाते होली मनाते हैं और बाद में एक−दूसरे के गले मिलकर होली की बधाई देते−लेते हैं। इस दिन शत्रु भी अपना वैर भाव भुलाकर एक−दूसरे को गले लगाते हैं।

हमारे देश में होली के त्योहार का अपना महत्व है। यह केवल गाने बजाने या रंग गुलाल का त्योहार ही नहीं है अपितु देश की एकता, अखण्डता, सार्व भौमिकता और प्यार−दुलार का भी त्योहार है। इस दिन लोग किसी चीज का बुरा नहीं मानते। इस त्योहार पर लोग पहले भांग का सेवन करते थे मगर अब कई प्रकार के नशे का भी सेवन करने लगे हैं। रासायनिक रंगों के प्रयोग से हमारे पर्यावरण को क्षति पहुंची है और रासायनिक रंगों से शरीर में अनेक प्रकार की व्याधियां हो जाती हैं। इसलिए नशे और रासायनिक रंगों से बचा जाना चाहिये। अनेक लोग पानी की बरबादी को देखते हुए सूखी होली भी खेलते हैं। होली का साक्षात चित्रण हमारे घरों में देखने को मिलता है। पुरानी हवेलियों, मंदिरों, किलों पर इस पर्व के चित्र आज भी देखने को मिल जायेंगे। ऐसा दूसरा उदाहरण हमें देखने को नहीं मिलेगा।

होली के इस पावन पवित्र पर्व पर हमें यह संकल्प लेना चाहिये कि हम बुराई का परित्याग कर अच्छाई को ग्रहण करेंगे। ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेंगे जो दूसरे को बुरा लगे। हम एक−दूसरे के सुख−दुख में भागीदारी देंगे और प्रेम और मोहब्बत के संदेश को घर−घर पहुंचाकर देश और समाज में सहिष्णुता, एकता और भाईचारे की भावना को विकसित करेंगे। इसी में हमारा, समाज का और देश का व्यापक हित निहित है।

- बाल मुकुन्द ओझा

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