By Ankit Jaiswal | Mar 01, 2026
पाकिस्तान में इस साल गेहूं को लेकर चिंता बढ़ती दिख रही है। मौजूद जानकारी के अनुसार देश को संभावित उत्पादन गिरावट का सामना करना पड़ सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिकी कृषि विभाग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान का गेहूं उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 20 से 22 लाख टन तक कम हो सकता है। यह अनुमान नीति-निर्माताओं के लिए चिंताजनक माना जा रहा है, क्योंकि गेहूं और उससे बने उत्पाद जैसे रोटी, नान और ब्रेड देश की बड़ी आबादी के दैनिक भोजन का आधार हैं।
गौरतलब है कि पाकिस्तान चावल और मक्का का बड़े पैमाने पर निर्यात करता है, लेकिन घरेलू उपभोग के लिए गेहूं पर अत्यधिक निर्भर है। ऐसे में उत्पादन में 20 लाख टन से अधिक की गिरावट खाद्य असुरक्षा को और बढ़ा सकती है।
स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि देश इस समय अफगानिस्तान के साथ बढ़ते तनाव और सीमावर्ती अस्थिरता से भी जूझ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में सुरक्षा हालात का असर कृषि गतिविधियों पर पड़ा है। बता दें कि ये क्षेत्र गेहूं उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
उत्पादन में गिरावट के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण लंबे समय तक चला सूखा और कम वर्षा है। पाकिस्तान मौसम विभाग के अनुसार 2025 की शुरुआत में वर्षा औसत से करीब 39 प्रतिशत कम रही। इसका असर खास तौर पर वर्षा-आधारित खेती वाले इलाकों में देखा गया। नतीजतन गेहूं की बुवाई का रकबा 10.37 मिलियन हेक्टेयर से घटकर करीब 9.1 मिलियन हेक्टेयर रह गया।
इसके अलावा सरकार द्वारा 2025–26 सीजन के लिए समर्थन मूल्य की घोषणा में देरी ने भी किसानों को असमंजस में डाला। कई किसानों ने अनिश्चितता के कारण कम बुवाई की, जिससे कुल उत्पादन प्रभावित हुआ। बढ़ती लागत और सीमित सरकारी सहायता ने भी खेती को कम लाभकारी बना दिया।
पंजाब, जिसे पाकिस्तान का “गेहूं कटोरा” कहा जाता है, इस संकट के केंद्र में है। यहां सिंचाई व्यवस्था पर जल संकट का दबाव साफ नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिंधु नदी तंत्र में जल प्रवाह में कमी और सीमित जल भंडारण क्षमता ने हालात और जटिल बना दिए हैं।
कुछ विश्लेषक 1960 के सिंधु जल संधि से जुड़े हालिया तनावों को भी अप्रत्यक्ष कारक मान रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक नदी जल डेटा साझा करने में बाधा और प्रवाह में लगभग 20 प्रतिशत कमी से जल प्रबंधन प्रभावित हुआ। इससे तरबेला और मंगला जैसे प्रमुख बांधों पर दबाव बढ़ा है।
इस बीच आटे की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। फरवरी 2026 के अंत तक 10 किलो आटे की कीमत कई शहरों में 890 से 1500 पाकिस्तानी रुपये के बीच रही, जबकि 20 किलो का बैग 1780 से 1810 रुपये तक बिक रहा है। प्रीमियम चक्की आटा 160 से 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। इस बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ रही हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उत्पादन में अनुमानित गिरावट वास्तविकता में बदलती है तो सरकार को आयात पर निर्भर होना पड़ सकता है। हालांकि विदेशी मुद्रा भंडार और महंगाई की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह आसान विकल्प नहीं माना जा रहा है।
कुल मिलाकर सूखा, जल संकट, नीतिगत देरी और क्षेत्रीय अस्थिरता का संयुक्त असर पाकिस्तान के गेहूं उत्पादन पर पड़ रहा है। आने वाले महीनों में स्थिति किस दिशा में जाती है, यह बारिश, सरकारी हस्तक्षेप और क्षेत्रीय हालात पर निर्भर करेगा, लेकिन फिलहाल खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता गहरी होती दिख रही है।