By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Jul 31, 2026
पूर्व सेना प्रमुख (सेवानिवृत्त) जनरल विश्वनाथ शर्मा का शुक्रवार को 96 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। भारतीय सेना ने यह जानकारी दी। जनरल शर्मा 30 जून 1988 से 30 जून 1990 तक सेना प्रमुख के पद पर रहे थे।
सेना की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जनरल शर्मा ने उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र में एक माउंटेन ब्रिगेड की कमान संभाली और उन्हें उत्कृष्ट सेवा के लिए 1977 में अति विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया। उन्होंने बाद में राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र में एक बख्तरबंद ब्रिगेड की कमान संभाली। वर्ष 1980 में जनरल शर्मा को मेजर जनरल के पद पर पदोन्नत किया गया और उन्होंने पश्चिमी क्षेत्र में एक माउंटेन डिवीजन की कमान संभाली।
वर्ष 1984 में वह लेफ्टिनेंट जनरल बने और पश्चिमी क्षेत्र में एक कोर की कमान संभाली। उत्कृष्ट सेवा के लिए उन्हें परम विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया। सेना अध्यक्ष जनरल धीरज सेठ के नेतृत्व में भारतीय सेना ने अनुभवी सैन्य अधिकारी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया।
सेना ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “सेना अध्यक्ष जनरल धीरज सेठ और भारतीय सेना के सभी रैंक के जवान परम विशिष्ट सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक, एडीसी और पूर्व सेना प्रमुख जनरल विश्वनाथ शर्मा के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हैं। भारतीय सेना उनके शोक संतप्त परिवार और प्रियजनों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदनाएं व्यक्त करती है।” रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी पूर्व सेना प्रमुख के निधन पर शोक जताया और कहा, “एक उत्कृष्ट सैनिक के रूप में जनरल शर्मा ने अटूट समर्पण, साहस और सम्मान के साथ देश की सेवा की।” उनका जन्म चार जून 1930 को हुआ था। जनरल विश्वनाथ शर्मा एक प्रतिष्ठित सैन्य परिवार से आते थे जिसने दो पीढ़ियों तक सशस्त्र सेनाओं में सेवा दी और देश को तीन जनरल दिए।
सेना के मुताबिक, “परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा के छोटे भाई होने के नाते विश्वनाथ शर्मा ने अपने परिवार के अद्भुत साहस और निस्वार्थ सेवा की विरासत को भी शानदार तरीके से आगे बढ़ाया।” मेजर सोमनाथ शर्मा, स्वतंत्र भारत के बाद पहला परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले सैनिक थे। जानकारी के अनुसार, जनरल विश्वनाथ शर्मा ने नैनीताल के शेरवुड कॉलेज और देहरादून के प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी के पांचवें रेगुलर पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया और चार जून 1950 को 16 लाइट कैवेलरी में शामिल हुए थे।