नर्मदा किनारे बसे भगवान ओंकारेश्वर, यहां चौथे प्रमुख ज्योतिर्लिंग की दो रुपों में होती है पूजा

By कमल सिंघी | Jul 14, 2020

मध्यप्रदेश के इंदौर से 77 किमी दूरी पर भगवान शिव का चौथा प्रमुख ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर के नाम से जाना जाता है। औंकार यानी ऊं का आकार लिए हुए। इस वजह से यहां भगवान ओंकारेश्वर के रुप में पूजे जाते हैं। ओंकारेश्वर में ज्योतिर्लिंग दो स्वरुपों में ओंकारेश्वर और ममलेश्वर की पूजन होती है।

जब कुबेर तपस्या से प्रसन्न हुए थे भगवान शिव

धार्मिक ग्रंथों में कथा है कि शिव भक्त कुबेर ने कठोर तपस्या की थी। इस तपस्या के लिए धनपति कुबेर जी ने यहां एक शिवलिंक स्थापित किया था। भगवान शिव कुबेर जी की भक्ति से प्रसन्न हुए और कुबेर  को देवताओं का धनपति बना दिया। भगवान शिव ने कुबेर के नहाने के लिए अपनी जटाओं के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की थी। यही नदी माता नर्मदा में यहां मिलती है। कावेरी नदी ओमकार पर्वत का एक चक्कर लगाने के बाद संगम पर वापस नर्मदा नदी में मिल जाती है। यही वजह है कि यहां चातुर्मास के खत्म होने के बाद धनतेरस पर खास पूजन होती है। यहां हर साल दिवाली की बारस की रात को ज्वार चढ़ाने का खास महत्व होता है। इसी रात में जागरण भी किया जाता है। धनतेरस की सुबह विशेष अभिषेक भी किया जाता है। इसके बाद कुबरे, महालक्ष्मी का महायज्ञ किया जाता है। इस पूजन से कुबेर का भंडार मिलता है और सुख शांति की प्राप्ति भी होती है।

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सावन में पूजन का खास महत्व

शिवपुराण में कहा गया है कि ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजन का महत्व है। यहां की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग और श्री ममलेश्वर के दर्शन का पुण्य भी शिवपुराण में बताया गया है। यहां नर्मदा स्नान का भी पावन फल मिलता है। हर इंसान को इस तीर्थ क्षेत्र की यात्रा जरुर करना चाहिए। लौकिक-पारलौकिक दोनों ही प्रकार के उत्तम फलों की प्राप्ति होती है। भगवान ओंकारेश्वर की कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है। सावन मास में लोकेश्वर महादेव भगवान शिव की पूजन का खास महत्व होता है। सावन मास में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। 

- कमल सिंघी

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