मुफ्त की राजनीति से लगेगी लंका, भारत के ये बड़े राज्य बन जाएंगे मिनी श्रीलंका?

By अभिनय आकाश | Apr 09, 2022

1987 में आई फिल्म प्रतिघात का जो गाना आज अचानक हमपे जो हैं मेहरबान… इनसे पूछो ये आज तक थे कहां आज 21वीं सदी में भी एकदम फिट बैठता है। सत्ता बदले या सरकार, मुद्दे बदले या विचार, चुनाव आयोग का नजरिया बदले या मीडिया के चुनाव कवरेज का तरीका , अगर नही बदला है तो सिर्फ़ मतदाताओ को उलझा कर उनको विकास के सपने  दिखाकर, रोजगार के नये अवसरो को पैदा करने का आश्वासन देकर, मुफ़्त का राशन, पानी, बिजली देने का झांसा देकर अपनी अपनी राजनीतिक रोटियों को सेंक सत्ता का भोग करना! कोई कहता है कि 200 यूनिट बिजली मुफ्त देंगे, तो दूसरा कहता है भईया हम तो 300 यूनिट बिजली फ्री देंगे। एक ने कहा हम मुफ्त में पानी देंगे। तो दूसरे ने कहां कि हम मुफ्त पानी के साथ कैशबैक भी देंगे। स्कूटी से साइकिल तक मोबाइल से लैपटॉप तक सब मुफ्त देने का वादा करते राजनेताओं को आपने कई बार सुना होगा। आज भी नेता वोटर को मुफ्तखोरी का मरीज समझते हैं। जब मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, रोजगार देने की जगह बेरोजगारी भत्ता, गरीबी भत्ता देने का ऐलान करके वोट बटोरने की चाह का खामियाजा आने वाले समय में देश को श्रीलंका जैसे हालात की कगार पर पहुंचा सकता है। मुफ्तवादी राजनीति के इसी संयोग और प्रयोग को आज इस रिपोर्ट के माध्यम से समझेंगे और साथ ही बताएंगे की भारत के ये राज्य कैसे मिनी श्रीलंका बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। 

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किन राज्यों पर ज्यादा कर्ज

2019 में श्रीलंका में चुनाव होते हैं। चुनावों के दौरान वहां के लोगों से ये वादा किया जाता है कि जितने भी नागरिक टैक्स भरते हैं वो आधा कर दिया जाएगा। इससे विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो गया। जिसकी वजह से डीजल खरीदना मुश्किल हो गया। अब सारे काम ठप्प हो गया। पीएम मोदी के साथ मीटिंग के दौरान उन राज्यों को लेकर भी चर्चा हुई जहां ऐसी स्थिति है। पंजाब, दिल्ली, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की लोकलुभावन घोषणाओं की वजह से इनकी वित्तीय हालत खराब हो गई। इसी तरह छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों ने पुरानी पेंशन स्कीम बहाल करने की घोषणा की। वहीं कई राज्य मुफ्त बिजली दे रहे हैं जो सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ा रहे हैं और जो आने वाले दिनों में उस कगार पर जा सकते हैं जिस कगार पर इस वक्त श्रीलंका है।  संबंधित बजट अनुमानों के अनुसार वित्त वर्ष 2022 में उच्चतम ऋण जीएसडीपी अनुपात वाले राज्य पंजाब (53.3%), राजस्थान (39.8%), पश्चिम बंगाल (38.8%), केरल (38.3%) और आंध्र प्रदेश (37.6%) हैं। इन सभी राज्यों को केंद्र से राजस्व घाटा अनुदान प्राप्त होता है। 

किस राज्य पर कितना कर्ज

 इन सभी राज्यों को केंद्र से राजस्व घाटा अनुदान प्राप्त होता है। वास्तव में, 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से सत्ताईस ने वित्त वर्ष 2021 में अपने ऋण अनुपात में 0.5 से 7.2 प्रतिशत अंक की वृद्धि देखी, क्योंकि राज्यों ने महामारी के लिए अधिक उधार लिया। पंजाब का जितना जीडीपी है उसका करीब 53.3 प्रतिशत हिस्सा कर्ज है। इसी तरह राजस्थान का अनुपात 39.8 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल का 38.8 प्रतिशत, केरल का 38.3 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश का कर्ज जीएसडीपी अनुपात 37.6 प्रतिशत है। इन सभी राज्यों को राजस्व घाटा का अनुदान केंद्र सरकार से मिलता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों पर भी कर्ज का बोझ कम नहीं है। गुजरात का कर्ज-जीएसडीपी अनुपात 23 फीसदी तो महाराष्ट्र का 20 फीसदी है। 

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राज्यों का कर्ज-जीडीपी अनुपात 2022-23 के लक्ष्य से कहीं अधिक रहने का अनुमान

रिजर्व बैंक के सालाना प्रकाशन ‘राज्य वित्त:2021-22 के बजट का एक अध्ययन’ में यह भी कहा गया है कि चूंकि कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर का प्रभाव अब काफी हद तक समाप्त हो गया है, ऐसे में राज्य सरकारों को कर्ज स्थिरता संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए विश्वसनीय कदम उठाने की आवश्यकता है। इसमें कहा गया है, ‘‘राज्यों का संयुक्त रूप से कर्ज-जीडीपी अनुपात मार्च, 2021 में 31 प्रतिशत था और मार्च, 2022 के अंत तक इसके इसी स्तर पर बने रहने की आशंका है। यह एफआरबीएम (राजकोषीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन) समीक्षा समिति की सिफारिशों के अनुसार 2022-23 तक 20 प्रतिशत पर लाने के लक्ष्य से कहीं अधिक है, जो चिंताजनक है।’’ बड़े राज्यों की बात करें तो पंजाब में सबसे खराब ऋण-से-जीडीपी अनुपात 39.9 प्रतिशत है, इसके बाद उत्तर प्रदेश है, जहां ऋण का स्तर सकल घरेलू उत्पाद का 38.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है। हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में भी ऋण-से-जीडीपी अनुपात सीमा से कहीं अधिक है। इसके विपरीत, असम, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना में ऋण-से-जीडीपी अनुपात सबसे कम है। 

कुल मिलाकर कहा जाए तो जब आपको फ्री में कोई चीज मिलती है तो उसका उस समय कोई नुकसान नहीं दिखाई देता। लेकिन आने वाले टाइम पर नुकसान जरूर होता है। अब आपको एक तस्वीर दिखाते हैं। ये तस्वीर स्विजरलैंड की है, जहां के आम नागरिकों से पूछा गया कि what would you do if your income were taken care of? क्या वे देश के नागरिकों के लिए एक तय इनकम के प्रावधान का समर्थन करते हैं या नहीं? इन नागरिकों में वे लोग भी शामिल थे, जो स्विट्जरलैंड में पांच साल से ज्यादा लंबे समय से बतौर कानूनी निवासी के तौर पर रह रहे हैं। इसमें हर वयस्क नागरिक को बिना काम भी करीब डेढ़ लाख रुपये प्रतिमाह देने की पेशकश की गई।  उस वक्त वहां के लोगों ने इसे साफ मना कर दिया कि हमें ये नहीं चाहिए। करीब 77 फीसदी नागरिकों ने इस तरह की योजना को नहीं चुना। उन्होंने कहा कि हमे बेरोजगारी भत्ता नहीं चाहिए। आपको याद होगा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा 2019 के दौरान एक वादा किया था कि यदि उनकी पार्टी लोकसभा चुनावों के बाद सत्ता में आती है तो न्यूनतम आय योजना (न्याय) के तहत देश के सर्वाधिक 20 प्रतिशत गरीब परिवारों को 72,000 रुपये तक सालाना नकद राशि दी जाएगी। उनकी इस घोषणा के बाद ही तमाम तरह की चर्चाएं होने लगीं कि क्या यह देश के वित्तीय हालात को देखते हुए संभव है? इसके लिए खर्च होने वाले लाखों करोड़ रुपये कहां से आएंगे? लेकिन भारत की जनता ने स्विजरलैंड की ही तर्ज पर कांग्रेस की योजना की बजाय आत्मनिर्भर बनना चुना और नतीजतन मोदी सरकार सत्ता में आई। 

-अभिनय आकाश 

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