हवा-पानी की आज़ादी के बिना आज़ादी अधूरी

By ललित गर्ग | Aug 14, 2025

देश एवं दुनिया के सामने स्वच्छ जल एवं बढ़ते प्रदूषण की समस्या गंभीर से गंभीरतर होती जा रही है। शुद्ध हवा एवं पीने के स्वच्छ जल की निरन्तर घटती मात्रा को लेकर बड़े खतरे खड़े हैं। धरती पर जीवन के लिये जल एवं हवा सबसे जरूरी वस्तु है, जल एवं हवा है तो जीवन है। जल एवं हवा ही किसी भी प्रकार के जीवन और उसके अस्तित्व को संभव बनाता है। जीवन के तीन आधार तत्व हैं-हवा, पानी और धरती है। इनकी संरक्षा न केवल हमारी अस्तित्व-निर्भरता से जुड़ी है, बल्कि मानवता की नैतिक जिम्मेदारी भी है। आज का युग, जिस तेज़ी से विकसित हो रहा है, उसी भागदौड़ में हवा और पानी को परम स्वाधीनता से वंचित कर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, दिल्ली का उच्च प्रदूषण सूचकांक, अमेरिका के जंगलों की धुएं से गंदली हवा, बढ़ता वाहन प्रदूषण-ये सब संकेत देते हैं कि हवा से आज़ादी मतलब ‘स्वस्थ हवा’ पाना है। हमारे “आज़ादी” को नया अर्थ चाहिए तो यह प्राकृतिक संसाधनों यानी हवा एवं पानी की आज़ादी पर भी निर्भर है, जो मानव व पर्यावरण-जगत दोनों के लिए जीवनदायिनी है। स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक बंधनों से मुक्ति नहीं है, बल्कि जीवन के हर पहलू में सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक अस्तित्व का अधिकार है। 78वें स्वतंत्रता दिवस पर जब हम आज़ादी का जश्न मना रहे हैं, तब यह सवाल भी उठाना जरूरी है कि क्या हमें हवा और पानी की सच्ची आज़ादी मिली है?

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जल संकट भविष्य में सबसे बड़ा युद्ध का कारण बन सकता है। भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ती युद्ध की संभावनाओं का कारण भी जल ही बनता हुआ दिख रहा है। ऑपरेश्न सिंधूर के बाद भारत ने पाक पर सिंधु जल समझौते को रद्द कर देने से पाक में जल संकट खड़ा हो गया है, पाक की ओर से परमाणु बम की धमकी दी जा रही है, वहीं भारत भी युद्ध की संभावनाओं को देखते हुए तैयार में जुट गया है। जल संकट केवल भारत और पाक में ही नहीं, दुनिया में एक बड़ी समस्या है। क्योंकि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, नदियों का प्रवाह घट रहा है, भूजल का स्तर गिर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, सूखा और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2000 से अब तक बाढ़ की घटनाओं में 134 प्रतिशत और सूखे की अवधि में 29 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। धरती का 70 प्रतिशत भाग पानी से भरा है, लेकिन पीने योग्य पानी केवल 3 प्रतिशत है, जिसमें से उपयोगी मीठा जल 1 प्रतिशत से भी कम है। बढ़ती जनसंख्या और बर्बादी ने इस अमूल्य संसाधन को गंभीर संकट में डाल दिया है।

दिल्ली और अन्य महानगरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार ‘बहुत खराब’ या ‘खतरनाक’ श्रेणी में पहुंचता है। प्रदूषित हवा श्वसन रोग, हृदय रोग और कैंसर तक का कारण बन रही है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है। रिसर्च बताती है कि दिल्ली के 75 प्रतिशत से अधिक बच्चों को सांस लेने में कठिनाई होती है, आंखों में जलन और खांसी की शिकायत रहती है। वाहन प्रदूषण, औद्योगिक धुआं, निर्माण गतिविधियों की धूल और फसल अवशेष जलाना-ये सब मिलकर हवा को ज़हरीला बना रहे हैं। 

भारत के पास जल प्रबंधन की प्राचीन परंपरा रही है-तालाब, कुएं, बावड़ियां, जोहड़ और सरोवर जल संरक्षण के अद्भुत उदाहरण हैं। राजस्थान के किलों और गांवों में जल संचयन व्यवस्था आज भी दुनिया के लिए प्रेरणा है। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहते थे-“अब भी खरे हैं तालाब।” आज आवश्यकता है कि हम इन परंपराओं को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर जल संकट का समाधान करें। सरकार ने ‘अटल भूजल योजना’, ‘नल से जल’ और ‘नदी पुनर्जीवन’ जैसी योजनाएं शुरू की हैं। लेकिन केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं, जनभागीदारी आवश्यक है। गांव-गांव में वर्षा जल संचयन, नदियों की सफाई, औद्योगिक अपशिष्ट का प्रबंधन और भूजल संग्रहण की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। हवा की शुद्धता के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक परिवहन को विश्वसनीय और सुलभ बनाया जाये, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जाये, औद्योगिक उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण हो, हरित क्षेत्र और वृक्षारोपण को बढ़ाना अत्यंत जरूरी कदम हैं। आज़ादी का असली मतलब यह है कि सत्ता का केंद्र नागरिक हो, उसकी मूलभूत सुविधाएं हो और उसकी आवाज़ सिर्फ़ चुनावी भाषणों में नहीं, नीतियों और फैसलों में भी सुनी जाए।

आजादी के अमृतकाल में 78वां स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए हमें हवा एवं पानी की आजादी के लिये संकल्प लेना होगा। वायु-जल संसाधनों पर गहराते संकट को खत्म करने के लिए अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन करना होगा। इसके लिए सभी लोगों को बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरूष, किसान, उद्यमियों सभी को पहल करनी है। पानी को बचाने एवं हवा की शुद्धि की आदत को व्यवहार में ढालना होगा। हवा में घूल रहा प्रदूषण भी खतरनाक होता जा रहा है। भू-विज्ञान मंत्रालय के एक रिसर्च के अनुसार वायु निर्माण में 41 प्रतिशत हिस्सेदारी वाहनों की रहती है। भवन निर्माण आदि से उड़नेवाली धूल 21.5 प्रतिशत के दूसरे स्थान पर है। दिल्ली परिवहन विभाग के आंकड़े के मुताबिक पिछले 30 साल में वाहन और उनसे होने वाला प्रदूषण तीन गुणा बढ़ गया है। फिर भी सार्वजनिक यातायात व्यवस्था को बेहतर और विश्वसनीय बनाने की दिशा में कुछ खास नहीं किया गया। इस विषम एवं ज्वलंत समस्या से मुक्ति के लिये हर राजनीतिक दल एवं सरकारों को संवेदनशील एवं अन्तर्दृष्टि-सम्पन्न बनना होगा। खेती में प्रदूषकों की रोकथाम से जल संसाधनों के संकट और पारिस्थिकी तंत्र में बदलाव के संकट को कम किया जा सकता है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को नियमित करके समस्या को काफी हद तक सुलझाया जा सकता है। उपलब्ध जल संसाधनों तक उपभोग को सीमित करके, संसाधन पर दवाब कम किया जा सकता है।

आज हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, विज्ञान और तकनीक में नए मुकाम हासिल हो रहे हैं। मेट्रो ट्रेन, डिजिटल पेमेंट, सैटेलाइट मिशन और वैश्विक मंच पर बढ़ता प्रभाव हमें गर्व से भर देता है। लेकिन इस चमक के पीछे एक सच छुपा है-हमारी आज़ादी अब भी अधूरी है। यह अधूरापन केवल गरीबी या बेरोज़गारी का नहीं, बल्कि शुद्ध हवा-पानी जैसी मूलभूत जरूरतों से जुड़ी सोच, व्यवस्था और व्यवहार में गहरे बैठी असमानताओं का है। हमने अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति पाई, लेकिन अगर हमारे बच्चे दूषित हवा में सांस लें और जहरीला पानी पिएं, तो यह कैसी आज़ादी है? आज़ादी का वास्तविक अर्थ तभी होगा जब हर नागरिक को स्वच्छ हवा और शुद्ध पानी मिले। 78वां स्वतंत्रता दिवस केवल झंडा फहराने और भाषण देने का नहीं, बल्कि जीवनदायिनी संसाधनों की रक्षा का संकल्प लेने का अवसर है। अपने घर, मोहल्ले और कार्यस्थल पर पानी बचाने की आदत डालें। प्लास्टिक का उपयोग कम करें। वर्षा जल संचयन करें। प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों का विरोध करें। वृक्षारोपण को जीवन का हिस्सा बनाएं। क्योंकि हवा और पानी की आज़ादी ही जीवन की सच्ची आज़ादी है।

- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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