दोस्ती वह रिश्ता है जो आप खुद बनाते हैं, बाकी सारे रिश्ते बने-बनाये मिलते हैं

By ललित गर्ग | Aug 01, 2021

अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस पर हर वर्ष अगस्त माह के पहले रविवार को मनाया जाता है। इस दिवस का विचार पहली बार 20 जुलाई 1958 को डॉ. रामन आर्टिमियो ब्रैको द्वारा प्रस्तावित किया गया था। यह दिवस जाति, रंग या धर्म के बावजूद सभी मनुष्यों के बीच दोस्ती और फैलोशिप को बढ़ावा देती है। हालांकि दोस्ती का यह त्योहार दुनियाभर में अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है, लेकिन इसके पीछे की भावना हर जगह एक ही है-दोस्ती का सम्मान। इस दिन दोस्त एक दूसरे को उपहार, कार्ड देते हैं। एक-दूसरे को फ्रेंडशिप बैंड बांधते हैं। दोस्तों के साथ पूरा दिन बिताकर अपनी दोस्ती को आगे तक ले जाने व किसी भी मुसीबत में एक दूसरे का साथ देने का वादा करते हैं।

इसे भी पढ़ें: Friendship Day: बच्चा हो या बड़ा हर किसी को दोस्त की जरूरत पड़ती है

दोस्ती वह रिश्ता है जो आप खुद तय करते हैं, जबकि बाकी सारे रिश्ते आपको बने-बनाये मिलते हैं। जरा सोचिए कि एक दिन अगर आप अपने दोस्तों से नहीं मिलते हैं, तो कितने बेचैन हो जाते हैं और मौका मिलते ही उसकी खैरियत जानने की कोशिश करते हैं। आप समझ सकते हैं कि यह रिश्ता कितना खास है। आज जिस तकनीकी युग में हम जी रहे हैं, उसने लोगों को एक-दूसरे से काफी करीब ला दिया है लेकिन साथ-ही-साथ इसी तकनीक ने हमसे सुकून का वह समय छीन लिया है जो हम आपस में बांट सकें। आज हमने पूरी दुनिया को तो मुट्ठी में कैद कर लिया है, लेकिन इसके साथ ही हम खुद में इतने मशगूल हो गये हैं कि एक तरह से सारी दुनिया से कट से गये हैं।

एमर्सन ने कहा है कि अच्छा मित्र प्राप्त करने से पहले अच्छा मित्र बनना आवश्यक है। मित्रता की इस भावना को बल देने के लिये मित्रता दिवस की आवश्यकता है, क्योंकि मित्रता दिवस मजबूत बनाता है हमारा संकल्प, हमारी जिजीविषा, हमारी संवेदना लेकिन उसके लिये चाहिए समर्पण एवं अपनत्व की गर्माहट। यह जीना सिखाता है, जीवन को रंग-बिरंगी शक्ल देता है। प्रेरणा देता है कि ऐसे जिओ कि खुद के पार चले जाओ। ऐसा कर सके तो हर अहसास, हर कदम और हर लम्हा खूबसूरत होगा और साथ-साथ सुन्दर हो जायेगी जिन्दगी। सुकरात ने कहा है कि मित्रता करने में धीमे रहें लेकिन एक बार जब मित्रता हो जाये तो दृढ़ और सतत बने रहें।

प्रश्न उभरता है कि इंसान के जीवन में इतना प्यारा तोहफा होने के बावजूद, उसके जीवन में मैत्री-भाव का इतना अभाव क्यों? क्यों है इतना पारस्परिक दुराव? क्यों है वैचारिक वैमनस्य? क्यों जनमता है मतभेद के साथ मनभेद? ज्ञानी, विवेकी, समझदार होने के बाद भी आए दिन मनुष्य लड़ता झगड़ता है। विवादों के बीच उलझा हुआ तनावग्रस्त खड़ा रहता है। ऐसे समय में दोस्ती का बंधन रिश्तों में नयी ऊर्जा का संचार करता है। दोस्ती के बहुत फायदे हैं, शोध कंपनी गैलप के अध्ययन के अनुसार, कार्यक्षेत्र में दोस्ताना माहौल होना, कर्मियों में कार्य संतुष्टि की भावना को बढ़ाता है। लोग बेहतर और ज्यादा काम कर पाते हैं। यहां तक कि कार्यक्षेत्र में एक अच्छा दोस्त होना ही काम से हमारे जुड़ाव को 50 प्रतिशत तक बढ़ा देता है।

मित्र, सखा, दोस्त, फ्रेंड, चाहे किसी भी नाम से पुकारो, दोस्त की कोई एक परिभाषा हो ही नहीं सकती। हमें तन्हाई का कोई साथी चाहिए, खुशियों का कोई राजदार चाहिए और गलती पर प्यार से डांटने-फटकराने वाला चाहिए। यदि यह सब खूबी किसी एक व्यक्ति में मिले तो निःसन्देह ही वह आपका दोस्त होगा, मित्र होगा। वही दोस्त, जिसके रिश्ते में कोई स्वार्थ या छल-कपट नहीं बल्कि आपके हित, आपके विकास, आपकी खुशियों के लिये जिसमें सदैव एक तड़फ एवं आत्मीयता रहेगी। नयी सभ्यता एवं नयी संस्कृति में ऐसी ही मानवीय संवेदनाओं को नई ऊर्जा देने के लिये अन्तर्राष्ट्रीय फ्रेंडस दिवस मनाया जाना एक सार्थक उपक्रम है।

दुश्मनी की तरह, दोस्ती का भी चक्र होता है। जो हम दूसरों को दे रहे होते हैं, वह हमारे पास भी जरूर लौटता है। भले ही यह वे लोग नहीं हों, जिनकी आपने मदद की थी। एक समय की आपकी अच्छाई, कई स्तरों पर अपना असर दिखाते हुए फैलती रहती है। अपनी सही मंशा, सरलता और सहयोग के भाव से आप दूसरों की जुबान पर ही नहीं, दिलों पर राज करने लगते हैं। और जब मित्रता स्वाभाविक गुण बन जाता है, तब हम आसपास के लोगों के लिए ही नहीं पेड़-पौधों और पक्षियों के भी दोस्त बन जाते हैं।

सच्चे दोस्त दुख और कष्ट के क्षणों में हमारे साथ अपनी मौजूदगी भर से हमें जिंदगी में आगे बढ़ने, संघर्ष करने और दुख व पीड़ा को हराकर इस जंग को जीतने की प्रेरणा देते हैं। दोस्त हमारे दुख व दर्द को हमसे छीन तो नहीं पाते, पर वे अपनी उपस्थिति से उस दर्द को सहने की हमारी शक्ति जरूर बढ़ा देते हैं। किसी ने बहुत ठीक कहा है- ‘‘मैं एक दोस्त ढूंढ़ने गया, लेकिन वहां किसी को नहीं पाया। मैं दोस्त बनने गया और पाया कि वहां कई दोस्त थे।’’

जोसेफ फोर्ट न्यूटन ने कहा कि “लोग इसलिए अकेले होते हैं क्योंकि वह मित्रता का पुल बनाने की बजाय दुश्मनी की दीवारें खड़ी कर लेते हैं।” क्षणिक और स्वार्थों पर टिकी मित्रता वास्तव में मित्रता नहीं, केवल एक पहचान मात्र होती हैं ऐसे मित्र कभी-कभी बड़े खतरनाक भी हो जाते हैं। जिनके लिए एक विचारक ने लिखा है- ‘‘पहले हम कहते थे, हे प्रभु! हमें दुश्मनों से बचाना परन्तु अब कहना पड़ता है, हे परमात्मा, हमें दोस्तों से बचाना।’’ दुश्मनों से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं दोस्त। मित्रता दिवस दोस्ती को अभिशाप नहीं, वरदान बनाने का उपक्रम है। यह दिवस वैयक्तिक स्वार्थों को एक ओर रखकर औरों को सुख बांटने एवं दुःख बटोरने की मनोवृत्ति को विकसित करने का दुर्लभ अवसर प्रदत्त करता है। इस दिवस को मनाने का मूल हार्द यही है कि दोस्ती में विचार-भेद और मत-भेद भले ही हों मगर मन-भेद नहीं होना चाहिए। क्योंकि विचार-भेद क्रांति लाता है जबकि मन-भेद विद्रोह। क्रांति निर्माण की दस्तक है, विद्रोह बरबादी का संकेत। स्वस्थ निमित्तों की श्रृंखला में मित्रता का भाव बहुत महत्वपूर्ण है।

इसे भी पढ़ें: कैसे फ्रेंडशिप डे की शुरुआत हुई और इसे क्यों सेलिब्रेट किया जाता है?

सुप्रसिद्ध अमेरिकी लेखक डेल कार्नेगी ने मित्र बनाने की कला पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं और वे लाखों, करोड़ों की संख्या में बिकती हैं। उसने एक पुस्तक में लिखा है- ‘मेरी सारी संपत्ति लेकर मुझे कोई एक सच्चा मित्र दे दो।’ अमेरिकी धन कुबेर हेनरी फोर्ड का उदाहरण देते हुए उसने लिखा है कि उससे एक बार पत्रकारों ने पूछा- आपके पास अपार धन संपत्ति है, सभी सुख सुविधाएं मौजूद हैं इतना सब होने पर आप जीवन में किस बात की कमी महसूस करते हैं?’ हेनरी फोर्ड ने कहा- धन संपत्ति के नशे में मैं एक भी सच्चा मित्र नहीं बना सका। फ्रेंडस बहुत मिले परन्तु वह फ्रेंडशिप केवल साथ खाने-पीने, मौज, शौक की ही थी। जो सच्चे दिल से मुझे चाहे और मैं उसे चाहूं, ऐसा एक भी मित्र मुझे नहीं मिला। यह मेरे जीवन की एक बहुत बड़ी रिक्तता एवं कमी है।

मित्रता संस्कृति है। संपूर्ण मानवीय संबंधों का व्याख्या-सूत्र है। लुइस एल. काफमैन ने कहा है कि मित्रता का बीज बोएं, खुशियों का गुलदस्ता पाएं। जबकि देखने में यह आ रहा है कि हम मित्रता का बीज बोने का वक्त ही नहीं तलाश पा रहे हैं। दोस्ती की खेती खुशियों की फसल लेकर आती है, लेकिन उसके लिये पारम्परिक विश्वास की जमीन और अपनत्व की ऊष्णता के बीज भी पास में होने जरूरी है। वास्तव में मित्र उसे ही कहा जाता है, जिसके मन में स्नेह की रसधार हो, स्वार्थ की जगह परमार्थ की भावना हो, ऐसे मित्र सांसों की बांसुरी में सिमटे होते हैं, ऐसे मित्र संसार में बहुत दुर्लभ हैं। श्रीकृष्ण और सुदामा की, विभीषण और श्री राम की दोस्ती इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं।

-ललित गर्ग

प्रमुख खबरें

Hindustan Zinc में Stake Sale की तैयारी, ₹80,000 करोड़ का Disinvestment Target पूरा करेगी सरकार

Womens Asia Cup से पहले Pakistan को बड़ा झटका, Najiha Alvi चोटिल होकर बाहर, Sadaf Shamas की हुई एंट्री

England Cricket में बड़ा बवाल, Nightclub के बाहर हथकड़ी में दिखे Brydon Carse टेस्ट मैच से बाहर

हरियाणा में Godrej Group का मेगा प्लान, 20,000 करोड़ के Investment से खुलेंगे 40,000 Jobs के नए द्वार