By अभिनय आकाश | Apr 06, 2026
दुनिया का रहनुमा, लोकतंत्र का प्रहरी, आतंकवाद का दुश्मन और खुद को सुपरपॉवर मुल्क मानने वाले देश के लुट-पिट कर लौटने की दास्तां है। कोरिया के पहाड़ों से लेकर वियतनाम के जंगलों और मध्य पूर्व के तपते रेगिस्तानों तक, अमेरिकी सेना की भूमिका हमेशा चर्चा और विवाद का केंद्र रही है। अक्सर यह बहस छिड़ती है कि इन लड़ाइयों का असली मकसद लोकतंत्र की रक्षा था या फिर अपने भू-राजनीतिक दबदबे को बनाए रखना। अमेरिका का इतिहास सैन्य हस्तक्षेपों और रणनीतिक संघर्षों की एक लंबी गाथा रहा है। दुनिया भर के तमाम युद्धों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना अमेरिका की विदेश नीति का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। अमेरिका का दूसरे देशो में दखलअंदाज और भूमिका को लेकर सवाल अमेरिका के भीतर और बाहर, दोनों जगह भी उठते रहे है।
1955 में उत्तरी वियतनाम ने जब दक्षिणी भाग पर सैन्य जमावड़ा शुरू किया तो अमेरिका ने कम्युनिज्म के फैलने से रोकने के लिहाजे से सैन्य कार्रवाई छेड़ दी। 1967 तक वियतनाम में अमेरिकी फौजियों की संख्या 5 लाख को पार कर गई। लेकिन 1969 आते-आते घरेलू दबाव की वजह से अमेरिकी ने वियतनाम से बाहर निकलने का मन बना लिया। 20 सालों की जंग के दौरान कई बार संधि पर समझौते हुए और सब बेकार हो गए। 1972 में अमेरिका और उत्तरी वियतनाम के बीच एक बार फिर बातचीत हुई और वो भी बेनतीजा रही। अमेरिकी सैनिकों पर बमबारी के बाद उसने भी अपने बी -52 विमान को मैदान में उतार दिया था। अमेरिका के 200 बी-52 विमानों ने 12 दिनों के भीतर उत्तरी वियतनाम पर 2 हजार टन बम गिराए थे। इसे अमेरिकी वायु सेना का अब तक का सबसे भीषण और चौंकाने वाला हमला माना जाता है, जिसे ऑपरेशन लाइनरबैकर-II का नाम दिया गया था। जनवरी 1973 में पेरिस में अमेरिका, उत्तरी वियतनाम और दक्षिण वियतनाम व वियतकॉन्ग के बीच एक शांति समझौता हुआ। इसी समझौते की आड़ में अमेरिकी वियतनाम से अपनी सेना हटाना चाहता था। इसके बाद वियतनाम में भी वही हुआ जैसा कि एक साल पहले अफगानिस्तान में देखने को मिला। अमेरिकी फौज के पूरी तरह से निकलने से पहले ही 29 मार्च 1973 को उत्तरी वियतनाम ने दक्षिणी वियतनाम पर हमला बोल दिया। दो साल बाद 1975 में 30 अप्रैल को कम्युनिस्ट वियतनाम की फौज साइगॉन में घुस गई और वहां बचे अमेरिकियों को आनन-फानन में भागना पड़ा।
1990 और 2003 के इराक युद्ध अमेरिकी विदेश नीति के दो सबसे अलग और विवादास्पद अध्याय हैं। जहाँ पहला युद्ध अंतरराष्ट्रीय सहमति पर आधारित था, वहीं दूसरा युद्ध 'अधूरे तथ्यों' और 'अति-महत्वाकांक्षा' की भेंट चढ़ गया। 1990 के खाड़ी युद्ध में सद्दाम हुसैन के कुवैत पर कब्जे के बाद, इराक पीछे नहीं हटा और अमेरिका ने ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म शुरू किया। इसका खर्च अरब देशों ने भी उठाया। लेकिन साल 2003 में जॉर्ज बुश प्रशासन ने 2003 में इराक पर अटैक किया। कहा गया कि सद्दाम के पास सामूहिक विनाश के हथियार है और उसके अल कायदा से भी रिश्ते बताए गए। हालाकि ऐसा कुछ भी नहीं निकला। एक बार अमेरिकी प्रशासन आलोचना का शिकार हुआ। इराक में पैदा हुए सत्ता के शून्य का फायदा उठाकर कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हुईं। जानकारों का मानना है कि आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट) की जड़ें इसी युद्ध के बाद फैली अराजकता में थीं। इस युद्ध ने न केवल इराक को बर्बाद किया, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में ईरान के प्रभाव को बढ़ा दिया, जिसे अमेरिका अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है।
दो दशकों तक अफगानिस्तान में सैन्य अभियान छेड़ने वाले अमेरिका ने साल 2021 में वहां के हालात से पल्ला झाड़ लिया। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की हड़बड़ी में हुई वापसी के बाद पैदा हुए हालात ने लोगों को 1975 के वियतनाम युद्ध की याद दिला दी है। पूर्वी एशिया के इस देश में अमेरिका कम्युनिज्म के खात्मे के दाखिल तो हुआ लेकिन परिस्थिति ऐसी बनी कि उसे उल्टे पांव भागना पड़ा। 29 फरवरी 2020 को दुनिया की एक बड़ी ताकत, दुनिया के दरोगा की हैसियत रखने वाला अमेरिका ने दुनिया के एक छोटे से भूभाग में तालिबान के आगे घुटने टेक दिए। अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते पर मुहर लग गई। समझौते के बाद अमेरिका का लक्ष्य होगा कि वो चौदह महीने के अंदर अगानिस्तान से सभी बलों को वापस बुला ले। 14 अप्रैल को अमेरिका सेना की वापसी का ऐलान किया गया था। उसके बाद अब 15 अगस्त को यानी 124 दिनों में तालिबान ने अफगान सरकार को घुटनों पर ला दिया। तालिबान ने ही फिर काबुल की सत्ता पर कब्जा कर लिया। माना जाता है कि इस युद्ध में $2.313 ट्रिलियन डॉलर खर्च हुए और 243,000 लोगों की जान गई। इसके अलावा अमेरिका ने खुद को सोमालिया, यमन और लीबिया जैसे युद्धों के बीच भी खुद को पाया। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने प्रचार के दौरान कहा था कि वो अंतहीन युद्धों के खिलाफ है। लेकिन अब लगता है कि उनकी अगुआई में अमेरिका ऐसे ही एक युद्ध में फिर उलझ गया है, जहा से निकासी का रास्ता भी नहीं दिख रहा।
बहलहाल, जहाँ 'खाड़ी युद्ध' ने उसकी सैन्य शक्ति का लोहा मनवाया, वहीं वियतनाम और अफगानिस्तान जैसे संघर्षों ने यह साबित कर दिया कि केवल आधुनिक हथियारों के दम पर किसी देश की विचारधारा या जमीनी हकीकत को नहीं बदला जा सकता। अंततः, ये युद्ध न केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बोझ बने, बल्कि दुनिया भर में उसकी नैतिक साख पर भी एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ गए हैं। आज भी यह सवाल बरकरार है कि क्या अमेरिका दुनिया का 'चौकीदार' बनने की कोशिश में खुद को और दुनिया को और अधिक संकट में डाल रहा है?