By अभिनय आकाश | Oct 11, 2022
"सदियों की बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है। दो राह समय के रथ का घर्र घर्र नाद सुनो, सिंहासन खाली करो की जनता आती है।"
कभी एक ही कांग्रेस पार्टी के थे दोनों
जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी कभी एक ही कांग्रेस पार्टी के थे, लेकिन वे अपनी विचार प्रक्रियाओं में ध्रुवीय विरोधी थे। 1966 से 1975 तक दोनों के बीच बातें कड़वी होती रहीं। नारायण, जो कभी इंदिरा के पिता के करीबी दोस्त थे और उन्हें इंदु बुलाते थे, औपचारिक रूप से उन्हें मिस इंदिरा बुलाने लगे थे। यह एक ऐसा समय था जब भारत तीव्र बेरोजगारी, ठप पड़ी अर्थव्यवस्था, उच्च मुद्रास्फीति और कुपोषण की समस्याओं से जूझ रहा था।
इंदिरा के बयान से आहत हुए जेपी
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार जय प्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी के संबंध चाचा और भतीजी वाले थे। लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे को जब जेपी ने प्रखरता से उठाना शुरू किया तो इंदिरा गांधी की एक प्रतिक्रिया से वो संबंध बिगड़ गया। 1 अप्रैल 1974 को भुवनेश्वर में इंदिरा ने बयान दिया कि जो बड़े पूंजीपतियों के पैसे पर पलते हैं, उन्हें भ्रष्टाचार पर बात करने का कोई हक़ नहीं है। कहा जाता है कि इस बयान से जेपी बहुत आहत हुए थे। इंदिरा के इस बयान के बाद जेपी ने पंद्रह बीस दिनों तक कोई काम नहीं किया। खेती और अन्य स्रोतों से होने वाली अपनी आमदनी का विवरण जमा किया और प्रेस को दिया और इंदिरा गांधी को भी भेजा।
इस तरह बिगड़े चाचा-भतीजी के संबंध
जयप्रकाश नारायण का आनंद भवन में तब से शुरू हो गया था, जब इंदिरा गांधी बच्ची थीं। जेपी और नेहरू की दोस्ती इस कदर थी कि जेपी अपने खतों में नेहरू को माई डियर भाई लिखा करते थे। इस नाते से इंदिरा भी उनकी भतीजी हो गईं। इस आत्मीय प्रेम का पता इंदिरा को लिखे पत्र में हमेशा से नजर आया। वो हमेशा उन्हें अपने खतों में माई डियर इंदु लिखा करते थे। लेकिन इंदिरा और जेपी के रिश्तों के तल्ख होने का असर इन खतों की भाषा पर भी पड़ा। इंदिरा को जेपी के लिखे खत में माई डियर इंदु नहीं थी, बल्कि वो उनके लिए माई डियर प्राइम मिनिस्टर बन गई।