History of Yemen | सऊदी अरब-UAE से ईरान, यमन कैसे बना जंग का मैदान?|Globmaster

By अभिनय आकाश | Jan 30, 2026

साल 2008 में 19 साल की एक लड़की केरला से लगभग 3000 किमी दूर एक दूसरे मुल्क पहुंचती है कुछ दिनों बाद वह भारत में अपनी मां के पास फोन करती है कहती है मां मुझे नौकरी मिल गई है अब हमारे बुरे दिन खत्म होने वाले हैं दरअसल कुछ ही दिनों में उस लड़की को एक सरकारी अस्पताल में काम मिल गया था फिर वहां रहते-रहते लड़की में आत्मविश्वास बढ़ा 2014 में उसने खुद का क्लिनिक खोलने की तरफ पहला कदम बढ़ा या घड़ी के साथ समय का कांटा बदला लगभग एक दशक बाद आज वो लड़की मिडिल ईस्ट के देश की जेल में बंद पाईं गईं और वहां के राष्ट्रपति ने उसे मौत की सजा सुना दी। निमिषा प्रिया को 16 जुलाई को फांसी दी जानी थी। उससे ठीक तीन दिन पहले मामला देश की सर्वोच्च अदालत के पास भी पहुंचा। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि  केरल की नर्स निमिशा प्रिया की फांसी को रोकने के लिए वह कुछ खास नहीं कर सकती। ये देश दुनिया के किसी भी अन्य हिस्से जैसा नहीं है। वो  दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक का सामना कर रहा है। यहां हूती का दबदबा चलता है। ये नाम अच्छे से याद कर लीजिए क्योंकि पूरी कहानी में इसका जिक्र बारमबार होने वाला है। एक तरफ फांसी की तैयारी चल रही थी तो दूसरी तरफ दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में इसे रुकवाने के प्रयास लगभग छिन्न होते जा रहे थे। 16 जुलाई को निमिषा को फांसी होनी थी लेकिन आखिर समय पर ये टल गई। जिसके बाद कहा जाने लगा कि जो हूती नियंत्रित शासन अमेरिका तक की नहीं सुनता वहां एक मौलाना ने इसे रुकवा दिया। केरल की नर्स निमिषा प्रिया की सजा-ए-मौत टाल दिए जाने के पीछे केरल के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबु बकर अहमद की भूमिका की भी खूब चर्चा हुई। आज के ग्लोबमास्टर में आपको मिडिल ईस्ट के एक और देश लिए चलते हैं। जिसके उत्तर में सऊदी अरब है और पूर्व में ओमान की सीमा है। बाकी दिशाओं में फैला है विशाल समुद्र। ये देश यमन है।

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शिया मुस्लिम गुट जो अमेरिका से भी नहीं डरता

कोई बगावत करता है और समूह में करता है तो विद्रोही गुट के नाम से पहचाना जाता है। लेकिन अगर कोई बगावत गुट को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया जाए तो क्या हो, तेल, परमाणु हथियार, शिया-सुन्नी, अरब सागर जद और भी हैं, पहलू और भी हैं। हूती कौन हैं और आख़िर ये क्या चाहते हैं। यमन के उत्तर पश्चिम में सैना नामक शहर है। 1990 के दशक में यहां पर द बिलिविंग यूथ नाम से एक छात्र आंदोलन शुरू हुआ। इसके फाउंडर का नाम बेद्दीन हुसैन अल हूती था। इस संगठन का मतलब जैदी इस्लाम का पुनर्जागरण था। दरअसल, ज़ैदी या ज़ैदिय्या शिया इस्लाम के एक संप्रदाय को कहते हैं जो मुख्यतः अधिकांश यमन मे एवं ईराक, ईरान, भारत, पाकिस्तान में थोडा जनसंख्या में मौजूद है। भारत मे यह मुख्यतः मुज़्जफरनगर जिले के आस पास सादात ए बाहरा के गांवों में मौजूद है। ये सम्प्रदाय चौथे इमाम हज़रत जै़नुलआबेदीन के पुत्र हज़रत ज़ैद की औलाद में से है। यमन में एक हजार सालों तक जैदी राजाओं का शासन रहा। 1962 में आखिरी जैदी सुल्तान इमाम अहमद की हत्या हुई और इसके बाद सिविल व़ॉर शुरू हुआ। इसके बाद यमन दो हिस्सों में बंट गया। फिर कुछ समय के लिए साउथ यमन में सोवियत संघ की हवा भी चली। फिर 1978 में उत्तरी यमन में एक आर्मी के अफसर अली अब्दुल्ला सालेह को राष्ट्रपति बनाया गया। उनके दौर में उत्तरी और दक्षिणी यमन के बीच फिर से लड़ाई हुई। जिसमें हजारों लोग मारे गए। 1980 का दशक आया तो सोवियत संघ कमजोर पड़ने लगा औऱ उसके गुट में शामिल देश बगावत करने लगे। यूटोपिया का सपना चकनाचूड़ हो चुका था और इसका असर यमन में भी नजर आया। उत्तरी और दक्षिणी यमन एक हो गए और ये रिपब्लिक ऑफ यमन कहलाया। अली अब्दुल्ला सालेह की सत्ता पर कोई आंच नहीं आई थी। इस सत्ता में सालेह को सऊदी और अमेरिका का भरपूर साथ मिला। 

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