By अभिनय आकाश | Mar 04, 2026
28 फरवरी 2026 की सुबह 6:45 बजे एक लड़ाकू विमान इज़राइल के एक गुप्त एयरबेस से उड़ान भरता है। यह कोई साधारण मिशन नहीं था। इस फाइटर जेट में ऐसे उन्नत मिसाइल और स्मार्ट हथियार लगे थे, जो करीब 1000 किलोमीटर दूर बैठे किसी लक्ष्य को भी सटीकता से निशाना बना सकते थे—यहां तक कि किसी इमारत के अंदर मौजूद लोगों को भी। पायलट को साफ निर्देश दिए गए थे कि उसे लंबी उड़ान भरते हुए ईरानी हवाई क्षेत्र में दाखिल होना था और ठीक सुबह 9:50 बजे तेहरान की पास्तूर स्ट्रीट पर स्थित एक खास इमारत पर हथियार गिराने थे। मिशन पूरा होते ही बिना किसी शोर-शराबे के उसे वापस इज़राइल लौट जाना था। दरअसल उस इमारत के अंदर एक बेहद अहम बैठक चल रही थी। इस बैठक में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के साथ देश के कई शीर्ष सैन्य और नागरिक अधिकारी मौजूद थे। यही वह पल था, जिसे इज़राइल और अमेरिका लंबे समय से तलाश रहे थे। एक ऐसा मौका, जब ईरान की पूरी शीर्ष नेतृत्व संरचना एक ही जगह पर मौजूद हो।
रणनीतिक रूप से यह अवसर बेहद दुर्लभ था। अगर यह मौका चूक जाता, तो शायद फिर कभी ऐसा अवसर हाथ नहीं आता। इसलिए पूरा ऑपरेशन बेहद गोपनीयता और सटीक समय-निर्धारण के साथ तैयार किया गया था। सब कुछ योजना के अनुसार आगे बढ़ता है। यही वह “एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़” था, जिसका अमेरिका को इंतजार था। क्योंकि एक बार यह आश्चर्य का तत्व खत्म हो जाता, तो ईरान के सर्वोच्च नेता तुरंत अपने भूमिगत बंकर में चले जाते और फिर उन्हें निशाना बनाना लगभग असंभव हो जाता। जो भी शीर्ष नेतृत्व वहां मौजूद था, वह तुरंत अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाता। ऐसी स्थिति में उन्हें ढूंढना और निशाना बनाना लगभग असंभव हो जाता। अमेरिका और इज़राइल लंबे समय से ईरान के नेतृत्व से ऐसी ही किसी रणनीतिक गलती का इंतज़ार कर रहे थे और जब यह मौका मिला, तो उसे पूरी तरह भुना लिया गया। पहला हमला इतना सटीक और घातक बताया गया कि इसमें ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के साथ लगभग 40 शीर्ष ईरानी सैन्य कमांडर मारे गए। इन लोगों में ईरान के रक्षा मंत्री और आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के कई बड़े कमांडर भी शामिल बताए गए। इन हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी यह स्वीकार किया कि जिन दो-तीन नेताओं को अमेरिका खामेनेई के बाद ईरान के संभावित नए नेता के रूप में देख रहा था, वे भी इस हमले में मारे गए।
लेकिन पिछले कुछ दिनों से दुनिया भर में एक ही सवाल पूछा जा रहा है कि यह हमला आखिर संभव कैसे हुआ? इज़राइल और अमेरिका को यह कैसे पता चला कि खामेनेई अपने शीर्ष अधिकारियों के साथ कब और कहां बैठक करने वाले हैं?
दरअसल, खुफिया जानकारी जुटाना इस पूरे ऑपरेशन का सिर्फ एक हिस्सा था। असली चुनौती तो उसके बाद शुरू होती है। हजारों किलोमीटर दूर से उड़ान भरने वाला वह फाइटर जेट जब अपने लक्ष्य के करीब पहुंचा, तो उसके पास सही इमारत की पहचान करने और हमला करने के लिए सिर्फ कुछ ही क्षण थे। ऐसे में पूरी कार्रवाई अत्यधिक सटीक समय, तकनीक और खुफिया नेटवर्क के तालमेल पर निर्भर थी। उस बैठक पर हमला करने के लिए एक बेहद छोटा समय का मौका था। इस मिशन में केवल समय और स्थान का ध्यान रखना ही काफी नहीं था, बल्कि ईरान में तैनात रूस निर्मित एयर डिफेंस सिस्टम से भी बचना जरूरी था। साथ ही दुश्मन के स्थानीय संचार नेटवर्क को भी निष्क्रिय करना था, ताकि अगर किसी को इस ऑपरेशन की भनक भी लगे, तो वह खबर आगे तक न पहुंच सके। अमेरिका और ईरान के बीच जो नया संघर्ष शुरू हुआ, उसकी शुरुआत भी इसी घटना से जुड़ी मानी जा रही है। और यह टकराव आगे कैसे खत्म होगा, इसकी दिशा भी काफी हद तक यहीं से तय हो सकती है। सीआईए और मोसाद जैसे खुफिया एजेंसियों की ईरान के भीतर कितनी गहरी पैठ हो चुकी है। आज दुनिया की कई खुफिया एजेंसियां इस ऑपरेशन से सबक लेने की कोशिश कर रही होंगी कि आखिर इतनी जटिल कार्रवाई को इतनी सटीकता के साथ कैसे अंजाम दिया गया।
जुलाई 2020 में, स्टक्सनेट के खुलासे के लगभग दस साल बाद, ईरान के नतांज़ परमाणु केंद्र को एक बार फिर निशाना बनाया गया। इस बार तरीका अलग था। बताया जाता है कि इज़राइल ने बेहद गुप्त तरीके से उस परिसर के अंदर एक बम पहुंचा दिया, जिसने नतांज़ की पूरी सेंट्रीफ्यूज असेंबली हॉल को तबाह कर दिया। लेकिन इस सूची में सबसे मशहूर और सबसे साहसिक ऑपरेशन जनवरी 2018 का माना जाता है। इसे आज भी कई लोग “सदी की सबसे बड़ी खुफिया चोरी” कहते हैं। इस ऑपरेशन में मोसाद के करीब दो दर्जन एजेंट रात के समय तेहरान के एक गोदाम में दाखिल हुए। वहां से उन्होंने 50,000 से अधिक पन्नों के दस्तावेज़ और 150 से ज्यादा कॉम्पैक्ट डिस्क चुरा लीं। इन दस्तावेजों में ईरान के AMAD प्रोजेक्ट से जुड़ी बेहद गोपनीय फाइलें शामिल थीं—जिनमें परमाणु हथियारों के डिजाइन, तस्वीरें, तकनीकी योजनाएं और कई संवेदनशील जानकारियां मौजूद थीं। मोसाद के एजेंटों ने रातों-रात इन दस्तावेजों को ट्रकों में भरकर ईरान से बाहर पहुंचा दिया, और उस समय किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी। ईरान को इस पूरी घटना का पता तब चला, जब कुछ महीनों बाद इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने लाइव टीवी पर इन दस्तावेजों को दुनिया के सामने पेश किया। उन्होंने इन्हें ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं का सबसे ठोस सबूत बताया। इन सभी घटनाओं से एक बात साफ होती है—पिछले करीब 20 वर्षों में इज़राइल ने न केवल ईरान की सुरक्षा परतों में कई बार सेंध लगाई है, बल्कि उसने बार-बार यह भी दिखाया है कि उसकी खुफिया एजेंसियां ईरान के भीतर गहराई तक पहुंच बनाने में सक्षम हैं।
इराक-इजराइल, 1963-1966: सोवियत संघ का मिग-21 तब सबसे एडवांस इंटरसेप्टर था। मोसाद ने इराकी पायलट मुनीर रेडफा को टारगेट किया, जो भेदभाव से जूझ रहे थे। उन्हें अपने साथ मिला लिया। 1966 में रेडफा मिग-21 विमान उड़ाकर इजराइल के हत्जोर एयरबेस पर उतरे। ये डेटा सीआईए के भी काम आया।
खासियत इस मिशन कीः मनोवैज्ञानिक प्रोफाइलिंग, मिग-21 एवियोनिक्स विश्लेषण और सुपरसोनिक फ्लाइट डेटा।
अल-किबार, सीरिया, 2007: मोसाद ने सीरियाई अधिकारी
के लैपटॉप से परमाणु रिएक्टर की तस्वीरें निकालीं। हमले के दौरान इजराइल ने सीरिया के एयर डिफेंस सिस्टम को हैक कर लिया, जिससे उनके अपने ही रडार पर उनके ही विमान गायब हो गए और इजराइली जेट्स ने इस बीच उनका रिएक्टर भी तबाह कर दिया।
खासियत इस मिशन कीः सीरिया के वायुसेना में जासूस पहुंचाया। एयरबोर्न साइबर अटैक, लैपटॉप डेटा ब्रीच और रडार स्पूफिंग।
लेबनान सीरिया, सितंबर 2024: इजराइली खुफिया तंत्र ने हिजबुल्लाह की सप्लाई चेन में घुसपैठ कर पेजर और वॉकी-टॉकी के भीतर विस्फोटक और रिमोट ट्रिगर चिप लगा दी। एक खास कोड भेजकर इन उपकरणों को एक साथ ब्लास्ट किया गया। दुबई में एक होटल में बायोमेट्रिक सिस्टम की कमजोरी का इस्तेमाल किया।
खासियत मिशन कीः पासपोर्ट क्लोनिंग, बायोमेट्रिक पहचान और डिजिटल फॉरेंसिक। एक में जासूसों ने सप्लाई चेन के भीतर घुसकर विस्फोटक फिट किया, तो दूसरे में बायोमेट्रिक डेटा की रेकी की।
आज इंटरनेट पर एक व्यंग्य भी काफी वायरल है। कहा जाता है कि अगर तीन ईरानी नेता किसी कमरे में मिलें, तो उनमें से दो मोसाद के एजेंट हो सकते हैं। यह मजाक भले ही अतिशयोक्ति हो, लेकिन इससे यह जरूर जाहिर होता है कि दुनिया में इज़राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद और अमेरिका की सीआईए की क्षमताओं को किस तरह देखा जाता है। दूसरी तरफ, इस पूरे मुद्दे पर अमेरिका और इज़राइल की नीतियों को लेकर भी कई सवाल उठाए जाते हैं। दुनिया को यह बताया जाता है कि इस लंबे छाया युद्ध, भारी खर्च और निवेश का मकसद सिर्फ एक है। ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना, ताकि वैश्विक सुरक्षा बनी रहे।
जून 2025 में जब इजरायल ने ईरान पर हमला किया तो इस अभियान के दौरान पांच लोगों की हत्या की गई। इनमें तीन वरिष्ठ सैन्य कमांडर और दो वैज्ञानिक शामिल थे, जिन्हें ईरान के परमाणु कार्यक्रम की गहरी जानकारी थी। किसी देश की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए वैज्ञानिकों की हत्या करना बेहद कठोर रणनीति लग सकती है, लेकिन इज़राइल के लिए यह कोई नई बात नहीं है। आज की इस कहानी में हम एक ऐसे ऑपरेशन की बात कर रहे हैं, जो हॉलीवुड की किसी थ्रिलर फिल्म जैसा लगता है। इतना अविश्वसनीय कि मानो यह विज्ञान-कल्पना की कहानी हो।
करीब पांच साल पहले, जिस व्यक्ति को कई लोग “ईरान का ओपेनहाइमर” कहते थे, वह भी उन रहस्यमयी हत्याओं की श्रृंखला का शिकार बन गया जिनका उद्देश्य ईरान की परमाणु क्षमता को विकसित होने से रोकना बताया जाता है। सवाल यह था कि ईरान के सबसे सुरक्षित और महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों में से एक की हत्या आखिर कैसे हो गई, और किसी ने हमलावर को देखा तक नहीं? नवंबर 2020 की एक ठंडी पतझड़ की सुबह थी। अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध एक प्रोफेसर अपनी पत्नी के साथ शहर से दूर अपने कंट्री हाउस की ओर जा रहे थे, ताकि कुछ दिनों का आराम कर सकें। उनका नाम था मोहसिन फख़रीज़ादेह। वे एक गंभीर स्वभाव के वैज्ञानिक थे। लेकिन इस इलाके में आकर वे थोड़ा सुकून महसूस करते थे। यहां देश के कई राजनीतिक और बौद्धिक लोग भी समय बिताने आते थे। फख़रीज़ादेह को यहां छोटी-छोटी चीजों में खुशी मिलती थी। जैसे दर्शनशास्त्र की किताबें पढ़ना या परिवार के साथ लंबी ड्राइव पर निकलना। उनकी काली सेडान कार सूने पहाड़ी इलाके से गुजर रही थी। उनके आगे सुरक्षा कर्मियों की एक गाड़ी चल रही थी और पीछे दो गाड़ियां सुरक्षा काफिले का हिस्सा थीं। तभी, बिना किसी चेतावनी के, शांत यात्रा अचानक भयानक हमले में बदल जाती है। अचानक गोलियों की बौछार कार के शीशे पर पड़ती है। कार झटके से मुड़ती है और चीखती हुई आवाज के साथ रुक जाती है। प्रोफेसर फख़रीज़ादेह कार से बाहर निकलते हैं। यद तब तक वे घायल भी हो चुके होते हैं और कार के खुले दरवाजे के पीछे झुक जाते हैं। तभी हमलावर अपना निशाना पक्का करते हैं। तीन गोलियां उनकी रीढ़ में लगती हैं। वे सड़क के बीचों-बीच गिर पड़ते हैं। नवंबर 2020 में प्रोफेसर मोहसिन फख़रीज़ादेह की हत्या ईरान के लिए बेहद शर्मनाक और चौंकाने वाली घटना बन गई। यह घटना उस समय हुई जब सिर्फ 10 महीने पहले ही अमेरिका ने ड्रोन हमले में ईरान के शीर्ष सैन्य कमांडर की हत्या की थी। प्रोफेसर मोहसिन फख़रीज़ादेह कोई साधारण वैज्ञानिक नहीं थे। वे ईरान के सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों में गिने जाते थे और देश के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े प्रमुख चेहरों में से एक माने जाते थे।