By नीरज कुमार दुबे | Jun 08, 2026
राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के रिश्तों को लेकर बहस तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने ताजा बयान के जरिए जिस तरह साल 2022 के राजनीतिक संकट, मानेसर प्रकरण और कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव का मुद्दा उठाया है, उसने साफ संकेत दे दिया है कि राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान अभी खत्म नहीं हुई है। हम आपको बता दें कि अशोक गहलोत ने न केवल अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने की कोशिश की, बल्कि यह भी जताया कि राजस्थान की राजनीति में उनकी भूमिका और प्रभाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
हम आपको याद दिला दें कि सितंबर 2022 का संकट कांग्रेस के लिए बड़ा मोड़ साबित हुआ था। उस समय लगभग तय माना जा रहा था कि अशोक गहलोत दिल्ली जाकर कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभालेंगे और राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन होगा। सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा भी तेज थी। लेकिन अचानक गहलोत समर्थक विधायकों ने इस्तीफे की पेशकश कर दी और कांग्रेस पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में विधायक दल की बैठक तक नहीं हो सकी। इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व की पूरी योजना बदल गई और अंततः मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस अध्यक्ष बने थे।
अब जब गहलोत इस पूरे घटनाक्रम को फिर से सामने ला रहे हैं, तो इसके पीछे केवल आत्मरक्षा नहीं बल्कि गहरा राजनीतिक संदेश भी दिखाई देता है। खासकर ऐसे समय में जब कांग्रेस संगठन में मल्लिकार्जुन खरगे का प्रभाव लगातार मजबूत हो रहा है और राहुल गांधी भी पहले की तुलना में अधिक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। पार्टी के भीतर यह चर्चा भी तेज है कि सचिन पायलट को राजस्थान में बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है, यहां तक कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए भी उनका नाम लिया जा रहा है।
यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक अशोक गहलोत के बयानों को उनकी राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। गहलोत यह याद दिलाना चाहते हैं कि राजस्थान कांग्रेस में आज भी बड़ी संख्या में विधायक और कार्यकर्ता उनके साथ खड़े हैं। वह कांग्रेस नेतृत्व को यह संकेत देना चाहते हैं कि राज्य की राजनीति को केवल दिल्ली से तय नहीं किया जा सकता।
राजस्थान की राजनीति में जादूगर के नाम से मशहूर गहलोत ने अपने बयान में यह भी कहा कि सचिन पायलट को मनमोहन सरकार में केंद्रीय मंत्री बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उन्होंने दुख जताया कि पायलट ने कभी सार्वजनिक रूप से इसका उल्लेख नहीं किया। यह बयान केवल भावनात्मक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल गहलोत एक तरफ यह दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने हमेशा पायलट को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, दूसरी तरफ वह यह भी संदेश दे रहे हैं कि राजनीतिक रिश्तों में विश्वास और स्वीकार्यता की कमी रही।
दिलचस्प बात यह है कि गहलोत ने पायलट के प्रति नरम भाषा भी अपनाई। उन्होंने कहा कि वह पायलट को बचपन से जानते हैं और आज भी उनके साथ हंसते बोलते हैं। लेकिन इसके साथ उन्होंने यह भी दोहराया कि मानेसर जाने और सरकार संकट में डालने की गलती पायलट पक्ष की थी। यानी उन्होंने रिश्तों में नरमी दिखाई, लेकिन राजनीतिक दूरी बनाए रखी। यही शैली गहलोत की राजनीति की पहचान रही है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू मल्लिकार्जुन खरगे से भी जुड़ता है। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद खरगे ने संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत की है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि राजस्थान में भी संगठनात्मक बदलावों को लेकर उनकी राय निर्णायक हो सकती है। गहलोत शायद यह महसूस कर रहे हैं कि पार्टी में नई शक्ति संरचना बन रही है, जिसमें सचिन पायलट का कद बढ़ सकता है। इसलिए वह समय रहते यह जताना चाहते हैं कि राजस्थान की राजनीति में उनकी अनदेखी आसान नहीं होगी।
देखा जाये तो आने वाले समय में इसका असर राजस्थान की राजनीति पर साफ दिखाई दे सकता है। यदि कांग्रेस नेतृत्व सचिन पायलट को संगठन या चुनावी रणनीति में बड़ी भूमिका देता है, तो गहलोत खेमे और पायलट खेमे के बीच संतुलन साधना पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर यदि नेतृत्व गहलोत की राजनीतिक ताकत को ध्यान में रखकर फैसले लेता है, तो पायलट समर्थकों में असंतोष बढ़ सकता है।
देखा जाये तो राजस्थान कांग्रेस की यह लड़ाई केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता नहीं है। यह अनुभव बनाम युवा नेतृत्व, संगठनात्मक पकड़ बनाम जनाधार और पुरानी बनाम नई राजनीति की लड़ाई भी है। गहलोत अपने अनुभव, विधायकों पर पकड़ और संगठनात्मक कौशल के सहारे अभी भी खुद को सबसे प्रभावशाली नेता साबित करना चाहते हैं, जबकि सचिन पायलट भविष्य के नेतृत्व के प्रतीक के रूप में उभर रहे हैं।
कुल मिलाकर देखें तो अशोक गहलोत के बयान यह संकेत देते हैं कि राजस्थान कांग्रेस में अंदरूनी संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। यह बयान कांग्रेस हाईकमान के लिए संदेश भी है, पायलट खेमे के लिए चेतावनी भी और अपने समर्थकों के लिए भरोसे का संकेत भी। आने वाले वर्षों में राजस्थान कांग्रेस का नेतृत्व किस दिशा में जाएगा, यह काफी हद तक इसी शक्ति संतुलन पर निर्भर करेगा।