By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Oct 22, 2021
नयी दिल्ली| केंद्र सरकार ने विदेशी चंदा (विनियमन) अधिनियम, 2010 में किए गए संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करने की उच्चतम न्यायालय से मांग करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि बिना किसी विनियमन के ‘बेलगाम विदेशी चंदा’ प्राप्त करना मौलिक अधिकार नहीं है।
हलफनामे में कहा गया है, ‘‘कुछ विदेशी ताकतें कुत्सित इरादों के साथ भारत की आंतरिक राजनीतिक में हस्तक्षेप करते हैं और ऐसी ताकतों को इससे रोकने के लिए यह संशोधन बहुत ही जरूरी था। ऐसे चंदे के लेन-देन पर प्रतिबंध का उद्देश्य ऐसे कुत्सित इरादों को रोकना और इसके खिलाफ कदम उठाना है।’’
हलफनामे में कहा गया है कि अधिनियम का उद्देश्य कुछ व्यक्तियों या संघों या कंपनियों द्वारा लिये जाने वाले विदेशी चंदे या विदेशी आतिथ्य को विनियमित करना है और ऐसी किसी भी गतिविधियों को प्रतिबंधित करना या रोकना है, जो राष्ट्रीय हित के विरुद्ध हैं। इसने आगे कहा, ‘‘बिना किसी विनियमन के बेलगाम विदेशी चंदा प्राप्त करने का कोई मौलिक अधिकार निहित नहीं है।’’
सरकार ने दलील दी है, ‘‘वास्तव में, ऐसा कोई मौलिक अधिकार मौजूद नहीं है जिसके तहत कोई भी कानूनी या इसके इतर अधिकार विदेशी चंदा प्राप्त करने के कथित अधिकार को शामिल करने के लिए कहा जा सकता है।’’ शीर्ष अदालत तीन अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें विदेशी चंदा विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 से संबंधित मुद्दे उठाये गये हैं। इनमें से दो याचिकाओं में अधिनियम में किए गए संशोधनों को चुनौती दी गई है, जबकि एक ने संशोधित और कानून के अन्य प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की मांग की है।
न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ 28 अक्टूबर को मामले की सुनवाई करेगी। केंद्र ने कहा कि वह राष्ट्रीय विकास में गैर-लाभकारी और स्वैच्छिक संगठनों की भूमिका को पहचानता है और वास्तविक गैर-सरकारी संगठनों को विदेशी चंदा (विनियमन) अधिनियम, 2010 के तहत अनिवार्य किसी भी नियामक अनुपालन से दूर होने की जरूरत नहीं है।
सरकार ने कहा है कि विनियमन के बिना विदेशी चंदा प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है। इसने कहा कि एसोसिएशन बनाने के अधिकार और व्यापार एवं पेशे की स्वतंत्रता के अधिकार में बेलगाम और अनियमित विदेशी चंदा प्राप्त करने का अधिकार शामिल नहीं हो सकता।